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चितवनि की आवश्यकता क्यों?

चितवनि के बिना आत्म जागृति सम्भव नहीं है । ज्ञान, प्रेम, सेवा, शुक्र बजाना, विनम्रता, संतोष, आदि का बहुत महत्व है, किन्तु इस जागनी ब्रह्माण्ड में चितवनि का आधार लिये बिना आत्म जागृति की कल्पना नहीं की जा सकती है । चितवनि के सम्बन्ध में अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के ये आदेश हैं-

ए मूल मिलावा अपना , नजर दीजे इत ।

पलक न पीछे फेरिए , ज्यों इश्क अंग उपजत ।। (श्री मुख वाणी- )

महामति कहे ए मोमिनो , ए सुख अपने अर्स के ।

एक पलक छोड़े नहीं , भला चाहे आपको जे ।। (श्री मुख वाणी- )

फेर फेर सरूप जो निरखिए , फेर फेर भूखन सिनगार ।

फेर फेर मिलावा मूल का , फेर फेर देखो ए मनुहार ।। (श्री मुख वाणी- परिकरमा)

निसदिन ग्रहिए प्रेम सों , युगल स्वरूप के चरन ।

निरमल होना याही सों , और धाम बरनन ।। (श्री मुख वाणी- )          

महामति जी के तन से श्री प्राणनाथ जी की लौकिक लीला समाप्त होने के पश्चात् चितवनि ही एकमात्र साधन है जिससे अक्षरातीत युगल स्वरूप का साक्षात्कार, उनकी कृपा, प्रेम, आनन्द व अन्य सभी उपलब्धियां प्राप्त की जी सकती हैं । सुन्दरसाथ के लिए तो यह परम धर्म है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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