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परमहंस किसे कहते हैं?

कबीर जी के मतानुसार वैकुण्ठ या निराकार (हद) तक अपनी पहुँच रखने वाले 'जीव' हैं । अखण्ड योगमाया (बेहद) तक पहुँच रखने वाले 'हंस' हैं तथा परमधाम का दर्शन करने वाले 'परमहंस' हैं ।

यद्यपि बहुत से सन्त, साधू, ऋषि, योगी जन भी स्वयं को परमहंस भले ही कहते हैं, किन्तु उनका ज्ञान वैकुण्ठ-निराकार से आगे का नहीं है ।

अक्षर ब्रह्म की पांच वासनाओं (आत्माओं) के अतिरिक्त कोई भी हंस अवस्था तक नहीं पहुँच सका । वे पंचवासनाएँ हैं- शिव जी, विष्णु जी, सुकदेव, सनकादिक तथा कबीर । अक्षर ब्रह्म की ईश्वरी सृष्टि का यही मार्ग है ।

जब तक कोई अक्षरातीत युगल स्वरूप श्री राजश्यामा जी का दर्शन नहीं कर लेता, उसे परमहंस कदापि नहीं कहा जा सकता । यह शोभा विशेषतः अक्षरातीत की ब्रह्मसृष्टियों को ही प्राप्त है, परन्तु तारतम ज्ञान के अवतरण के पश्चात् संसार के जीवों के लिए भी अक्षरातीत के साक्षात्कार का मार्ग खुल गया है । 

अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के प्रकटन के बाद ही इस संसार में परमधाम का तारतम ज्ञान अवतरित हुआ । इस ब्रह्मज्ञान को पाकर ब्रह्मसृष्टियों ने प्राणनाथ जी पर अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया । उनकी कृपा से ५०० सुन्दरसाथ ने उनके मूल स्वरूप तथा परमधाम का साक्षात्कार किया और सर्वप्रथम परमहंस पद प्राप्त किया । अक्षरातीत ��्री प्राणनाथ जी की साक्षात् संगति के कारण उन्होंने ऊँची से ऊँची आध्यात्मिक उपलब्धि भी अत्यन्त सरलता से प्राप्त कर ली । अतः श्री निजानन्द सम्प्रदाय में ही सर्वप्रथम यह अद्भुत चमत्कार हुआ ।

नदी किलकिला तीर पे , उतरे परमहंस आए ।

तिन में सिरदार अक्षरातीत , देख अपना ठौर सुख पाए ।।  (श्री बीतक साहेब ६०/१२) 

सदगुरु श्री देवचन्द्र जी (श्यामा जी) और धाम धनी श्री प्राणनाथ जी साक्षात् सच्चिदानन्द स्वरूप हैं । उन्हें परमहंसों का सिरदार माना गया है । अतः उन्हें परमहंसों के समकक्ष माना भूल है, अपितु उनकी ही कृपा से ही तो कोई परमहंस बन पाता है ।

श्री महामति जी की लौकिक लीला पूर्ण होने के पश्चात् भी जिन सुन्दरसाथ ने तारतम ज्ञान प्राप्त करके प्रेम व चितवनि का मार्ग अपनाया तथा श्री प्राणनाथ जी पर समर्पण किया, उन्हे श्री जी की कृपा से अनमोल उपलब्धियां प्राप्त हुईं । श्री प्राणनाथ जी ही गुप्त रूप से परमहंसों के माध्यम से ब्रह्मसृष्टियों की जागनी का कार्य आज भी कर रहे हैं । श्री महामति जी के तन में विराजमान उनका आवेश समर्पित परमहंस ब्रह्मसृष्टियों के तन में कुछ क्षणों के लिए प्रकट होकर बड़े-बड़े जागनी कार्य कर जाता है । ऐसे ही विशिष्ट परमहंसों की जीवनी का यहां वर्णन किया गया है ।

इस खण्ड में वर्णित परमहंसों की जीवनी से यह प्रेरणा मिलती है कि भले ही आखिर के सुन्दरसाथ श्री प्राणनाथ जी की प्रत्यक्ष संगति से वंचित रह गये हैं, परन्तु आन्तरिक दृष्टि से देखने पर वे अति निकट दिखाई देते हैं । परमधाम का आनन्द एवं परमहंस पद प्राप्त करने का सुन्दर अवसर आज भी सभी सुन्दरसाथ के लिए उपलब्ध है । अतः सभी सुन्दरसाथ का परम धर्म है कि वे श्री प्राणनाथ जी पर पूर्ण समर्पण करके परमहंस बनें तथा अन्य ब्रह्मसृष्टियों की जागनी में प्रयासरत रहें ।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि करोड़ों-अरबों वर्षों से जब से यह ब्रह्माण्ड चल रहा है, बहुत सारे ऋषि, मुनि, अवतार, पैगम्बर, मसीहा, आदि ने इस संसार में जन्म लिया परन्तु उनमें से एक भी परमहंस नहीं था । आज श्री निजानन्द सम्प्रदाय का सौभाग्य है कि हजारों परमहंस एक-साथ उसके अन्दर प्रकट हो गये हैं । परमहंसों का आदर्शमय जीवन सुन्दरसाथ के लिए प्रेरणा उपलब्ध कराता है, परन्तु एक बात विचारणीय है कि उनका कथन तभी अनुकरणीय होता है जब वह श्री प्राणनाथ जी के कथन (श्री मुख वाणी) के अनुकूल हो ।

यहाँ मात्र कुछ ही परमहंसों की जीवनियाँ वर्णित है । पाठकजन इसे परमहंसों की सूचि का एक छोटा सा अंश समझें क्योंकि जब श्री प्राणनाथ जी के साथ ५०० परमहंसों का समूह था तो यह कल्पना की जा सकता है कि उस अनमोल काल के बाद व्यतीत हुए तीन सौ वर्षों में कितने परमहंसों ने जागनी की लीला की होगी । यहाँ वर्णित परमहंसों की जीवनियों का क्रम समयानुसार है, अतः पाठकजन यह न समझें कि कोई परमहंस बड़ा या छोटा है । हमारी दृष्टि में सभी परमहंस समान रूप से परम आदरणीय हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा