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चितवनि क्या है?

आत्मिक दृष्टि से परमधाम (दिव्य ब्रह्मपुर धाम), श्री युगल स्वरूप अक्षरातीत तथा अपनी परआतम (आत्मा का मूल तन) को देखना ही चितवनि (ध्यान) है ।

सर्वप्रथम सदगुरु श्री देवचन्द्र जी (श्री श्यामा जी) ने चितवनि के मार्ग पर चलकर दिखाया । चितवनि करते समय उन्हें साक्षात्कार भी हुआ । तत्पश्चात् महामति जी (श्री इन्द्रावती जी) ने इस मार्ग को अपनाया तथा अपनी लौकिक लीला के अन्तिम तीन वर्ष पन्ना जी में चितवनि करके सुन्दरसाथ के लिए भी एक उदाहरण प्रस्तुत किया । उनपर समर्पित ५०० परमहंस सुन्दरसाथ ने भी चितवनि करके भरपूर लाभ उठाया । 

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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