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  अध्यात्म  »  सच्चा धर्म कौन सा है 

सच्चा धर्म कौन सा है ?

महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में कहा है कि जिससे लौकिक उन्नति के साथ-साथ मोक्ष की भी प्राप्ति हो, वह ही धर्म है । महाभारत का कथन है कि धर्म ही सम्पूर्ण प्राणिमात्र को धारण करने वाला है । इस कथन का यह स्पष्ट भाव है कि धर्म के बिना मानव अपनी गरिमा भूल कर पशुत्व के स्तर पर आ जाएगा ।

धर्म और सम्प्रदाय को एक ही समझना बहुत बड़ी भूल है । र्म एक वृक्ष है और सम्प्रदाय उसकी शाखायें । धर्म के शाश्वत सत्य को महापुरुषों ने जितना आत्मसात् किया, उतने सत्य को महापुरुषों ने कालांतर में सम्प्रदाय का रूप दे दिया । सबका आध्यात्मिक स्तर समान न होने से एक ही परम सत्य के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न विचारधारायें बन गईं, जिसने आज विद्वेष का रूप ले लिया है ।

वर्तमान समय में वैदिक (हिन्दू) धर्म में लगभग १००० सम्प्रदाय हैं, जिनमे से लगभग ७०० सम्प्रदाय ऐसे हैं जिनका किसी मान्य ग्रन्थ से स्पष्ट और सत्य दार्शनिक आधार नहीं है। शेष ३०० सम्प्रदायों में से अधिकतर ऐसे हैं , जो अपने सिद्धांतों को आर्ष ग्रन्थों से पूर्णरूप से प्रमाणित नहीं कर पाते । यहाँ तक कि कुछ अपने को अलग धर्म मानते हैं ��

वस्तुतः अध्यात्म ज्ञान के जिज्ञासु को आठ प्रमाणों से सत्य-असत्य की परीक्षा करनी चाहिए। १) प्रत्यक्ष २) अनुमान ३) उपमान ४) शब्द ५) ऐतिहय ६) अर्थापत्ति ७) संभव ८) अभाव । यहाँ ध्यान रखने योग्य बात है कि यदि ७ प्रमाण एक तरफ हों और शब्द प्रमाण (अपौरुषेय ग्रन्थ का कथन) उनके विपरीत हो, तो भी शब्द प्रमाण को ही सत्य माना जाता है ।

पूर्ण वास्तविकता यह है कि वर्तमान विश्व में प्रचलित सभी धर्मों को तो पंथ या सम्प्रदाय ही कहा जा सकता है क्योंकि धर्म तो एक ही है - सत्य । सत्य धर्म ही एकमात्र धर्म है जो एक परब्रह्म परमात्मा का मार्ग दिखाता है । सभी पंथ (जिन्हे धर्म कहा जाता है उदाहरणार्थ हिन्दू, मुस्लिम , ईसाई मत , आदि) तो उसी सत्य धर्म की शाखाएँ हैं , जो विभिन्न भाषाओं में उस एक सच्चिदानन्द परमात्मा का मार्ग दिखाते हैं ।  

शतपथ ब्राह्मण का कथन है कि जो एक परब्रह्म को छोड़कर अन्य की भक्ति करता है , वह विद्वानों में पशु के समान है (शतपथ ब्राह्मण १४/४/२/२२) । महापुरुषों व देवी-देवताओं की भक्ति नहीं , अपितु उनके गुणों का अनुसरण करना चाहिए । वेद का कथन है कि उस अनादि अक्षरातीत परब्रह्म के समान न तो कोई है , न हुआ है और न कभी होगा । इसलिए उस परब्रह्म के सिवाय अन्य किसी की भक्ति नहीं करनी चाहिए (ऋग्वेद ७/३२/२३) ।

अन्ततः , सत्य , अपौरुषेय ब्रह्मज्ञान (तारतम) को प्राप्त कर एक परमात्मा की भक्ति करना ही सत्य धर्म का पालन करना है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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