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  निजानन्द दर्शन  »  तीन सृष्टियां 

तीन सृष्टियाँ

निजानन्द दर्शन के अनुसार तीन पुरुषों की तीन भिन्न सृष्टियाँ व तीन ही बुद्धियाँ हैं ।

सास्त्रों तीनों सृष्ट कही , जीव ईश्वरी ब्रह्म ।

तिनके ठौर जुदे जुदे , ए देखियो अनुकरम ।।     (श्रीमुख वाणी- कि. ७३/२२)

शास्त्रों में तीन प्रकार की सृष्टि कही गयी है- १) जीव सृष्टि २) ईश्वरी सृष्टि ३) ब्रह्म सृष्टि । जीव सृष्टि क्षर पुरुष से है, ईश्वरी सृष्टि अक्षर ब्रह्म से है तथा ब्रह्म सृष्टि अक्षरातीत परब्रह्म से है । इन तीनों का धाम (निवास स्थान) भी क्रमशः अलग-अलग ही है ।

वेद में भी कहा गया है कि सात्विक, राजसी एवं तामसी ये तीन प्रकार की प्रजाएँ (जीव सृष्टि) हैं, जो अत्यधिक आवागमन को प्राप्त होती हैं । दूसरी प्रकार की त्रिगुणातीत बन्धन-मुक्त प्रजाएँ (ईश्वरी सृष्टि और ब्रह्म सृष्टि)  हैं, जो अर्चना करने योग्य परम पूज्यनीय परब्रह्म के आश्रय में हैं। (अथर्व. १०/८/३)

सुबुध निकट न आवहीं , चले बेहेर दृष्ट ।

आतम दृष्ट न लेवहीं , तो कही सुपन की सृष्ट ।।   (श्रीमुख वाणी- कि. ७९/८)

���ीव सृष्टि की दृष्टि बहिर्मुखी होती है और सदबुद्धि इनके पास नहीं आती । इनका ध्यान आत्मिक दृष्टि को जागृत करने पर नहीं होता, अतः इन्हें स्वप्न की सृष्टि भी कहते हैं ।

एही सृष्ट ईश्वरी जाग्रत , आई अक्षर नूर से जे ।

मेहेर ले मेहेबूब की , रहे तुरी अवस्था ए ।।  (श्रीमुख वाणी- कि. ७९/११)

अक्षर ब्रह्म से प्रकट होने वाली यह ईश्वरी सृष्टि है, जो जागृत कही जाती है । प्रियतम अक्षरातीत की कृपा से यह तुरीय अवस्था (प्रकृति-माया से सम्बन्ध तोड़कर ब्रह्म के साक्षात्कार एवं आनन्द) में डूबी रहती है ।

ब्रह्मसृष्टि आई अर्स से , जीत इंद्री सुध अंग ।

छोड़ मांहें बाहेर दृष्ट अन्तर , परआतम धनी संग ।।   (श्रीमुख वाणी- कि. ७९/१२)

ब्रह्मसृष्टि परमधाम से इस संसार को देखने आयी है । उनका अपनी इन्द्रियों पर अधिकार होता है । उनका अन्तःकरण भी बहुत पवित्र होता है । वह अपनी दृष्टि को पिण्ड (मांहें) और ब्रह्माण्ड (बाहर) से परे उस परमधाम से जोड़े रखती है । वह अपने मूल स्वरूप (परआतम) का श्रृंगार सजकर पल-पल धाम धनी (अक्षरातीत) के प्रेम में खोयी रहती है । दृष्टास्वरूप वह ब्रह्मसृष्टि इस प्रकृति (माया) की दुःख रूपी लीला को देखकर वापस अपने परमधाम में स्थित हो जाएँगी।

जीव सृष्टि बैकुंठ लो , सृष्ट ईश्वरी अछर ।

ब्रह्म सृष्ट अछरातीत लों , कहें सास्त्र यों कर ।।     (श्रीमुख वाणी- कि. ७३/२३)

शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि जीव सृष्टि का घर वैकुण्ठ है । ईश्वरी सृष्टि का मूल घर अक्षर ब्रह्म का हृदय अर्थात् योगमाया का ब्रह्माण्ड है । ब्रह्मसृष्टि का मूल घर अक्षरातीत का धाम (परमधाम) है ।

तीनों पुरुषों व उनकी सृष्टियों की तीन बुद्धियों का भी वर्णन किया गया है । क्षर (आदि नारायण) तथा सभी प्राणियों में स्वप्न की बुद्धि है । अक्षर ब्रह्म व ईश्वरी सृष्टि में जागृत बुद्धि तथा अक्षरातीत पूर्णब्रह्म व ब्रह्मसृष्टि में निज बुद्धि है, जो एकमात्र परमधाम में ही है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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