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  निजानन्द दर्शन  »  तीन पुरुष और उनकी लीला 

तीन पुरुष और उनकी लीला-

गीता में कहा गया है कि दो पुरुष हैं- क्षर एवं अक्षर । सभी प्राणी एवं पंचभूत आदि क्षर हैं तथा इनसे परे कूटस्थ अक्षर ब्रह्म कहे जाते हैं । इनसे भी परे जो उत्तम पुरुष अक्षरातीत हैं, एकमात्र वे ही परब्रह्म की शोभा को धारण करते हैं । (गीता १५/१६,१७)

कुछ लोग भ्रमवश प्रकृति को अक्षर कहते हैं । इस सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त कारण प्रकृति तो जड़ तथा नश्वर है । इसके अतिरिक्त, यदि प्रकृति अक्षर है तो उसे पुरुष के रूप में वर्णित क्यों नहीं किया गया ?

कुछ लोग अज्ञानता के कारण जीव तथा नारायण को ही अक्षर कहते हैं । नारायण और जीव एक ही स्वरूप हैं तथा दोनों महाप्रलय में नष्ट हो जाते हैं ।

तारतम ज्ञान की दृष्टि में यह सम्पूर्ण साकार-निराकार जगत (प्रकृति, नारायण सहित) क्षर है, इससे परे तेजमय��� अविनाशी ब्रह्म अक्षर हैं तथा उनसे भी परे सच्चिदानन्द स्वरूप अक्षरातीत हैं ।

इन तीन अलौकिक पुरुष व उनकी लीलाओं का विस्तृत वर्णन पढ़ें-

१. क्षर पुरुष

२. अक्षर पुरुष

३. अक्षरातीत परब्रह्म

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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