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त्रिधा लीला

श्री कृष्ण जी के वास्तविक स्वरूप का बोध विरले लोगों को ही है । बहुत कम लोग जानते हैं कि श्री कृष्ण नाम तो एक ही रहा है, किन्तु उसमें लीला करने वाली तीन शक्तियां अलग-अलग समय पर कार्य करती रही हैं ।

तारतम ज्ञान की दृष्टि तथा धर्मग्रन्थों के कथनों से यह स्पष्ट होता है कि इस नश्वर ब्रह्माण्ड में ११ वर्ष ५२ दिन तक श्री कृष्ण के तन में अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के आवेश ने ब्रज में लीला की ।

ब्रज लीला करने के पश्चात् जब अक्षरातीत का आवेश योगमाया के ब्रह्माण्ड में गया तो इस ब्रह्माण्ड का महाप्रलय कर दिया गया था । उस समय मोहतत्व के भी नष्ट हो जाने पर कुछ भी नहीं बचा था (पुराण संहिता २९/४५) । यदि महाप्रलय की स्थिति न मानें तो यह प्रश्न होता है कि बांसुरी की आवाज सुनते ही सभी गोपियों की आत्मा तो अपना तन छोड़कर योगमाया के ब्रह्माण्ड में महारास खेलने जा चुकी थीं, तो उनके तनों के दाह संस्कार का कहीं भी वर्णन क्यों नहीं आया ? अपितु श्रीमद्भागवत् ���ें तो यह लिखा है कि गोपों ने प्रातःकाल अपनी पत्नियों (गोपियों) को अपने पास सोते हुए पाया । यह तथ्य स्पष्ट करता है कि ये गोपियां नयी थीं, जिन्हें पूर्व ब्रह्माण्ड के महाप्रलय हो जाने का कुछ भी अहसास नहीं था ।

अचानक ही योगमाया की शक्ति के द्वारा उत्पन्न किए हुए उस महामोहसागर के अन्दर पुनः प्रपञ्चमयी ब्रह्माण्ड बनकर प्रकट हो गया (पुराण संहिता २९/४६) । यह नया ब्रह्माण्ड जैसा का तैसा बना दिया गया जिसमें प्रतिबिम्ब की लीला हुई । प्रतिबिम्ब लीला में गोलोक (योगमाया) के श्री कृष्ण की शक्ति भूलोक के श्री कृष्ण के तन में तथा वेद ऋचा कुमारिकाओं के जीव गोपियों (सखियों) के तन में विराजमान हुए । गोलोकी श्री कृष्ण ने कुमारिका सखियों के साथ गोकुल में सात दिन तक रास लीला की तथा चार दिन मथुरा में कंस वध आदि लीला की ।

कंस का वध करने के पश्चात् ही गोलोकी शक्ति ब्रज में राधाजी के हृदय में विराजमान हो गयी । यही कारण है कि वर्षों तक विरह में तड़पने के बाद भी राधा सहित गोपियां मथुरा जाकर विष्णु स्वरूप श्री कृष्ण से भेंट नहीं कर सकी थीं, जबकि गोकुल और मथुरा के बीच केवल सात कि.मी. की दूरी है ।

गोलोकी लीला के पश्चात् वैकुण्ठ नाथ विष्णु भगवान ने ११२ वर्ष तक श्री कृष्ण के तन में लीला की । इस लौकिक लीला में गुरुकुल शिक्षा, रुक्मणि (लक्ष्मी) हरण, योग साधना, असुरों का संहार, द्वारिका स्थापन, महाभारत युद्ध, गीता उपदेश, आदि सम्मिलित हैं ।

'बृहद्सदाशिव संहिता' ग्रन्थ में त्रिधा लीला का बहुत ही सुन्दर वर्णन है, जो इस प्रकार है-

सच्चिदानन्द लक्षणों वाले अक्षरातीत ने ही श्री कृष्ण के रूप में, प्रियाओं द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, नित्य वृन्दावन में प्रेमपूर्वक लीला की ।।७।। खेल देखने की इच्छा के कारण होने वाली वियोगमयी लीला के विहार में अपनी प्रियाओं का अनुसरण करने वाले परब्रह्म ने अपने अंशरूप आवेश के साथ अक्षर ब्रह्म की सुरता (चित्तवृत्ति) सहित ब्रजमंडल में आकर वास किया ।।८।। नित्य वृन्दावन के अन्दर जो गुह्य लीला हुई, वह अक्षर ब्रह्म से भी परे स्थित अक्षरातीत की लीला थी । वह गुह्य से भी गुह्य एवं मन-वाणी से अगम है । वह लीला अब अक्षर ब्रह्म के हृदय में अखण्ड रूप से स्थित है ।।९।। नित्य वृन्दावन में परब्रह्म की लीला रूप जो परम ऐश्वर्य स्थित है, वही गोकुल में बाल्यावस्था तथा किशोर लीला के भेद से कहा गया है ।।१०।।

वैकुण्ठ का जो वैभव है, वह मथुरा एवं द्वारिका में स्थित कहा गया है । वृन्दावन और मधुवन में जो लीला रूप ऐश्वर्य स्थित है, वह गोलोक के आश्रय से हुआ है ।।११।।

रास लीला के समय श्रुतियों के द्वारा स्तुति किए जाने पर श्री कृष्ण जी ने प्रसन्न होकर उन्हें इच्छानुकूल वरदान दिया । अतः वृन्दावन एवं मधुवन के अन्दर गोलोकी श्री कृष्ण जी ने उन सखियों के साथ सात दिन तक लीला की । पुनः ब्रज मण्डल को छोड़कर मथुरा चले गए । चार दिनों के अन्दर कंस आदि को मारकर धाम पहुँचा दिया ।।12,13।। इसके बाद वे अपने तेज सहित गोपियों के हृदय रूपी धाम में गुप्त रूप से स्थित हो गए । तब उनके विरह से व्याकुल चित्त वाली श्रुति रूपा सखियां उस गोलोक धाम में चली गईं ।।१४।।

इसके बाद पृथ्वी का भार हरण करने की इच्छा से मथुरा में चक्रधारी विष्णु रूप श्री कृष्ण कुछ वर्षों तक रहे ।।१५।। इसके बाद वे द्वारिका गये और तत्पश्चात् वैकुण्ठ में विराजमान हो गए । इस प्रकार श्री कृष्ण जी की त्रिधा लीला का यह रहस्य बहुत ही गोपनीय तरीके से कहा गया है ।।१६।।

'बुद्ध गीता' ग्रन्थ के श्रुतिः अध्याय श्लोक १० में ब्रह्मा जी ने नारद जी से त्रिधा लीला का निम्न वर्णन किया है-

"विष्णु एवं आदि विष्णु का स्वरूप एक ही है । इनसे भिन्न जो अक्षर ब्रह्म हैं, उनकी ये स्वप्न में कला रूप हैं । जन्म के समय जो वसुदेव को पुत्र के रूप में प्राप्त हुआ था, वह विष्णु भगवान का परम तेजोमय स्वरूप था । जो जेल से गोकुल में ले जाया गया था, वह उनसे भी भिन्न गोलोकी शक्ति का स्वरूप था । ब्रज में जिसने सखियों के साथ लीला की, वह परम ज्योतिमय अलौकिक अक्षर ब्रह्म का स्वरूप था । जिसने योगमाया के अन्दर रास की लीला की, वह अक्षर ब्रह्म की आत्मा से युक्त अक्षरातीत की शक्ति के द्वारा किया हुआ कहा गया । इस प्रकार विष्णु, अक्षर ब्रह्म एवं अक्षरातीत की प्रतिभासिक लीला के ये तीन स्थान हैं, किन्तु परब्रह्म अक्षरातीत की वास्तविक लीला का तेजोमय स्थान इनसे भिन्न ही है, जो उनके ही समान चेतन रूप वाला तथा अखण्ड है ।"

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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