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अक्षरातीत परब्रह्म

पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप निराकार (मोहतत्व) से परे बेहद, उससे परे अक्षर से भी परे है । मुण्कोपनिषद् में कहा गया है कि उस अनादि, अविनाशी, कूटस्थ अक्षर ब्रह्म से परे जो चिदघन स्वरूप है, उन्हें ही अक्षरातीत कहते हैं । परब्रह्म, परमात्मा, पूर्णब्रह्म, सनातन पुरुष, श्री राज, प्राणनाथ, आदि उन्हीं के सम्बोधन हैं ।

अतिशय तेज (असंख्यों सूर्य) से प्रकाशमान, अति मनोहारिणी, यशोरूप तेज से चारों ओर से घिरी हुई, अति तेजस्विनी, किसी से भी न जीती गई उस ब्रह्मपुरी में ब्रह्म प्रवेश किए हुए हैं । (अथर्ववेद १०/२/३३)

आठ चक्रों और नवद्वारों से युक्त, अपने आनन्द स्वरूप वालों की, किसी से युद्ध के द्वारा विज��� न की जाने वाली (अयोध्या) पुरी है । उसमें तेज स्वरूप कोश सुख स्वरूप है जो ज्योति से ढका हुआ है (अथर्ववेद १०/२/३१) । यहाँ आठ चक्रों का तात्पर्य शरीर के आठ चक्रों से अथवा प्रकृति के आठ आवरणों से नहीं है क्योंकि यह तो नाशवान हैं, जबकि इस ब्रह्मपुरी को अमृत स्वरूप कहा गया है । श्रीमुख वाणी में वर्णित परमधाम को घेरकर आए आठ सागरों को ही आठ चक्र कहकर सम्बोधित किया गया है । इसी प्रकार नवद्वारों को परमधाम की नव भूमियों के लिए वर्णित किया गया है । अयोध्या कहने का अभिप्राय है कि इस परमधाम में संसार का कोई भी जीव (नारायण सहित) ध्यानावस्था में कदापि प्रवेश नहीं कर सकता । सशरीर तो कोई भी प्राणी निराकार से आगे योगमाया में भी नहीं जा सकता ।

बुध तुरिया दृष्ट श्रवना , जेती गम वचन ।

उतपन सब होसी फना , जो लो पोहोंचे मन ।।   (श्रीमुख वाणी- कि. २७/१६)

बुद्धि, चित्त, मन, दृष्टि, श्रवण और वाणी की पहुँच से वह परब्रह्म सर्वथा परे हैं । यह उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही नश्वर है । इसलिए यहाँ की किसी भी वस्तु से उस परम तत्व को कहा नहीं जा सकता है ।    

अक्षरातीत नूरजमाल , ए तरफ जाने अछर नूर ।

एक या बिना त्रैलोक को , इन तरफ की न काहू सहूर ।। (श्रीमुख वाणी- सि. २/५४)

अर्थात् एकमात्र अक्षर ब्रह्म ही पूर्णब्रह्म अक्षरातीत (नूरजमाल) के विषय में जानते हैं । उनके अतिरिक्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अक्षरातीत की कोई भी जानकारी नहीं है । अतः पूर्ण ब्रह्म का विषय अति गोपनीय है तथा तारतम ज्ञान के बिना उन्हें नहीं जाना जा सकता है ।

उस तेजोमय कोश में तीन अरे (अक्षर ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म तथा आनन्द अंग) तीन (सत् चित् आनन्द) में प्रतिष्ठित हैं । उसमें जो परम पूज्यनीय तत्व, परमात्मस्वरूप हैं, उसका ही ब्रह्मज्ञानी लोग ज्ञान किया करते हैं । (अथर्ववेद १०/२/३२)

वह परब्रह्म सत् , चिद् , आनन्द लक्षणों वाला है, इसलिए उसे सच्चिदानन्द कहते हैं । परब्रह्म स्वयं चिदघन स्वरूप हैं, उनकी सत्ता का स्वरूप अक्षर ब्रह्म हैं तथा आनन्द का स्वरूप श्री श्यामा जी हैं । यह तीनों मिलकर सच्चिदानन्द स्वरूप कहलाते हैं । वैसे तो वह तीनों एक ही स्वरूप माने जायेंगे, परन्तु उनमें लीला रूप में भेद है । अक्षर ब्रह्म सत्ता के स्वरूप हैं जबकि अक्षरातीत अपनी आनन्द अंग श्यामा जी व आत्माओं के साथ पवित्र प्रेम व आनन्द की लीला करते हैं । 

अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म श्री राज जी का स्वरूप अक्षर ब्रह्म की भांति सर्वदा एकरस रहता है । उनके स्वरूप में न तो ह्रास होता है, न ही विकास । उनका स्वरूप नूरमयी (शुक्रमयी), अनन्य प्रेममयी और आनन्दमयी है ।

सरूप सुन्दर सनकूल सकोमल , रूह देख नैना खोल नूरजमाल ।   (श्रीमुख वाणी- कि. ११२/१)

श्री महामति जी कहते हैं कि हे मेरी आत्मा ! तू अपने नेत्रों को खोलकर अपने आधार (अक्षरातीत) का दर्शन कर, जिनका स्वरूप अति सुन्दर, प्रफुल्लित और कोमल है । 

इन सिंघासन ऊपर , बैठे जुगल किसोर ।

वस्तर भूखन सिनगार , सुन्दर जोत अति जोर ।।  (श्रीमुख वाणी- सागर १/११८)

परमधाम में सिंहासन पर अपने अनुपम किशोर स्वरूप में श्री राज श्यामा जी (पूर्णब्रह्म अक्षरातीत व उसकी आनन्द स्वरूपा) विराजमान हैं । उनके वस्त्र, आभूषण तथा श्रृंगार ज्योति से परिपूर्ण अत्यधिक सुन्दर हैं ।

परमधाम में स्वलीला अद्वैत है । वहाँ का कण-कण सच्चिदानन्दमयी है । जिस प्रकार चन्द्रमा से चांदनी, सागर से लहरें, सूर्य से किरणें अलग नहीं होती, उसी प्रकार सच्चिदानन्द परब्रह्म से आत्मायें कभी अलग नहीं होती , बल्कि उन्ही का स्वरूप होती हैं । यही 'स्वलीला अद्वैत' का रहस्य है ।

अछरातीत के मोहोल में , प्रेम इस्क बरतत ।

सो सुध अक्षर को नहीं , जो किन विध केलि करत ।।  (श्रीमुख वाणी- कि. ७४/२९)

अक्षरातीत परब्रह्म के रंगमहल में अनन्य प्रेम (इश्क) की सर्वदा ही लीला होती रहती है । अक्षरातीत अपनी प्रियाओं (आत्माओं) से किस प्रकार प्रेम की लीला करते हैं, इसकी जानकारी अक्षर ब्रह्म को भी नहीं थी ।

परमधाम भी अक्षरातीत के समान नूरमयी, मनोहारिणी व अत्यधिक प्रकाशमान है । वहाँ प्रत्येक वस्तु में चार गुण हैं- चेतनता, नूर (तेज), कोमलता और सुगन्धि । वहाँ की हर वस्तु अक्षरातीत का ही स्वरूप है, उन्हीं के समान चेतन और उनकी प्रेम की लीला में भली प्रकार सम्मिलित होती है । प्रत्येक वस्तु प्रेम और आनन्द के रस से ओत-प्रोत है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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