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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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     श्री प्राणनाथ जी का वाङमय कलेवर 
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श्री प्राणनाथ जी का वाङमय कलेवर

अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने इस २८वें कलयुग में प्रकट होकर परमधाम का अलौकिक ज्ञान प्रस्तुत किया । प्रकृति के नियमानुसार इस लौकिक तन (श्री मिहिरराज) की लीला को विराम देते हुए, श्री प्राणनाथ जी ने श्री कुलजम स्वरूप वाणी को ही अपने स्थान पर पधराकर अपने समान शोभा दी ।

श्री बीतक वाणी में सुन्दरसाथ लक्ष्मी दास जी का प्रसंग आता है । उसके माध्यम से श्री राज जी ने सभी ब्रह्मसृष्टियों को यह शिक्षा दी है कि तारतम वाणी का कथन सर्वोपरि है । अक्षरातीत के श्री मुख से अवतरित इ��� वाणी के सिद्धान्तों से बढ़कर कुछ भी मान्य नहीं है ।

अतः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यह वाणी अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी का ही वाङमय (ज्ञानमय) स्वरूप है, अर्थात् श्री प्राणनाथ जी तथा इस ब्रह्मवाणी के स्वरूप में कुछ भी भेद नहीं है । इस वाणी के चौदह अंग श्री जी के चौदह अंगों के समतुल्य हैं । श्री प्रेम सखी (परमहंस महाराज श्री गोपालमणि जी) ने इस एकरूपता को अति सुन्दर ढंग से वर्णित किया है, जिसे सभी सुन्दरसाथ संध्या आरती में गाते हैं-

आरती अंग चतुर्दश केरी । पांच स्वरूप मिल एक भये री ।।१।।

यह आरती श्री प्राणनाथ जी के चौदह अंग युक्त ज्ञानमय स्वरूप की है । उनके स्वरूप में पाँचों शक्तियाँ (अक्षरातीत श्री राज का आवेश, श्री श्यामा जी की आत्मा, श्री अक्षर ब्रह्म की आत्मा, जागृत बुद्धि का फ़रिस्ता इस्राफील, परब्रह्म के जोश का फ़रिस्ता ज़िबरील) विद्यमान हैं । ऐसे सर्वशक्तिमान स्वरूप ने यह दिव्य वाणी अवतरित की है ।

रास चरण प्रकास पिंडुरियां । खटऋतु घूटन कलश जंघन की ।।२।।

श्री रास ग्रन्थ में परम पवित्र प्रेम की झलक प्रस्तुत की गई है । जिस प्रकार चरण पर ही शरीर स्थिर होता है, उसी प्रकार प्रेम ही अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप का आधार है । इसी लिए रास ग्रन्थ की उपमा श्री जी के चरणों से की गई है । जिस प्रकार चरणों में पिंडली की शोभा होती है, उसी प्रकार श्री महामति जी को इस संसार में सारी शोभा दी गई है । वह श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप का ही अंग हैं ।

मानव शरीर में घुटने के बिना चलने की क्रिया नहीं हो सकती । उसी प्रकार विरह की वाणी खटरूती श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप में घुटने की शोभा रखती है क्योंकि विरह के बिना प्रेम परिपक्व नहीं हो सकता । श्री कलस ग्रन्थ को जांघों की उपमा दी गई है । जिस प्रकार जांघ में पैरों की शक्ति विद्यमान होती है, वैसे ही कलस की वाणी में श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पहचान श्री विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में कराई गई है । जांघ पैरों को शरीर से जोड़ते हैं, उसी प्रकार कलस ग्रन्थ में प्रस्तुत सिद्धान्त ही सभी हिन्दू ग्रन्थों का आधार हैं ।

सनंध कमर कर कीरंतन सोहे । नाभि खुलासा उदर खिलवत की ।।३।।

श्री सनंध ग्रन्थ को कमर की उपमा दी गई है । कमर या रीढ़ ही शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है । उसी प्रकार सनंध ग्रन्थ में हिन्दू पक्ष की गवाहियों तथा क़ुरआन की आयतों का वास्तविक अर्थ वर्णित करके, उनके प्रमाणों से श्री प्राणनाथ जी के ज्ञान की पुष्टि की गई है । श्री किरन्तन ग्रन्थ को कर (हाथ) की उपमा दी गई है । जिस प्रकार हाथ से सभी कार्य सम्पादित होते हैं, वैसे ही किरंतन ग्रन्थ में सभी विषयों का समावेश होने से सभी पक्षों के ज्ञान में पारंगत हुआ जा सकता है । 

नाभि में मानव तन की सभी नस-नाड़ियों का मिलन होता है । अतः खुलासा ग्रन्थ में सभी धर्मों व पंथों के एकीकरण की बात सिद्ध की गई है । उदर में पचने वाले भोजन से ही मानव तन जीवित रहता है । उसी प्रकार खिलवत ग्रन्थ परमधाम (मारिफत) के ज्ञान की भूमिका है जिसमें वर्णित इश्क-रब्द (प्रेम प्रसंग) ही इस सम्पूर्ण जागनी लीला का मूल कारण है ।

हृदय तवाफ कण्ठ सागर छबि । मुख सिनगार नासिका सिंधी ।।४।।

अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के हृदय से ही सम्पूर्ण परमधाम के पच्चीस पक्ष की लीला सम्पादित होती है । परिकरमा ग्रन्थ में परमधाम की शोभा व लीला का विस्तृत वर्णन है, इसलिए उसे हृदय की उपमा दी गई है । कण्ठ से मनुष्य की श्वास (प्राण) क्रिया चलती है तथा कण्ठ दबाने से उसकी मृत्यु हो सकती है । वैसे ही सागर ग्रन्थ में श्री जी के हृदय के आठ सागरों का वर्णन किया गया है, जो प्राणों के समान निकट हैं । अतः सागर को ही कण्ठ कहा गया है ।

मुख मण्डल से ही किसी व्यक्ति की सुन्दरता, तेज व शोभा का ज्ञान होता है । सिनगार ग्रन्थ में अक्षरातीत श्री राज जी के नूरी स्वरूप का वर्णन किया गया है, जो उनके सौन्दर्य के साथ-साथ उनके हृदय में भरे हुए अनन्त सागरों के आनन्द रस को भी प्रकट करता है । इसलिए सिनगार ग्रन्थ को मुख की उपमा देना उचित ही है । नासिका किसी भी व्यक्ति के आत्मसम्मान का द्योतक होती है । सिंधी ग्रन्थ में प्रेम के विभिन्न रसों (प्रेममयी नोंक-झोंक) का समिश्रण है जो एक समर्पित आत्मा के अधिकारों व महत्व (मूल स्वरूप) का बोध कराता है । अतः सिन्धी ग्रन्थ नाक की उपमा से सुशोभित है ।

श्रवण मारफत नयन सो कयामतनामा । चौदह अंग मिलि एक धनी के ।।५।।

श्रवण (कान) व नयन (नेत्र) से दृश्य (सत्य) को सुना व देखा जाता है । मारफत सागर को श्रवण कहने का अभिप्राय है कि इसमें निहित मारिफत (परम सत्य) ज्ञान को सुनने वाला परम तत्व का जानकार हो जाता है तथा अखण्ड मुक्ति को प्राप्त करता है । उसी प्रकार कयामतनामा को नयन कहा गया है । इस ग्रन्थ में श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप को आख़रूल इमाम महंमद महदी का स्वरूप सिद्ध किया गया है । कयामतनामा ग्रन्थ रूपी नेत्रों से देखने पर ही श्री जी के असल स्वरूप की पहचान होती है ।

इस प्रकार यह चौदह अंग मिलकर अक्षरातीत धाम धनी श्री प्राणनाथ जी का वाङमय (ज्ञानमय) स्वरूप बनते हैं ।     

श्री सुन्दर श्री इन्द्रावती जीवन । प्रेम सखी बलि बलि चरनन की ।।६।।

श्री सुन्दर बाई (श्री श्यामा जी) व श्री इन्द्रावती सखी का जीवन श्री प्राणनाथ जी की कृपा व प्रेम से पूर्ण रूप से सफल हो गया। ऐसे सुन्दर स्वरूपों के चरण कमलों पर श्री प्रेम सखी अपने को न्यौछावर करती हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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