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क्षर पुरुष

अक्षर ब्रह्म के मन (अव्याकृत) के स्वप्न में मोह सागर (महत्तत्व) में नारायण (आदि पुरुष , विराट पुरुष) का स्वरूप प्रकट होता है , जिन्हें क्षर पुरुष या प्रणव (ॐ) कहते हैं । उन्हें ही आदि नारायण , हिरण्यगर्भ , महाविष्णु , प्रथम पुरुष , शब्द ब्रह्म , आदि नामों से जाना जाता है । इन्हीं से वेद प्रकट होते हैं तथा सभी जीव इन्हीं की चेतना का प्रतिभास स्वरूप हैं। सम्पूर्ण जीव समुदाय , पञ्च भूतात्मक जगत, अष्टधा प्रकृति (पञ्चभूत, मन, बुद्धि, अहंकार) , आदि नारायण तथा महाशून्य (मोह सागर) सभी क्षर पुरुष के अन्तर्गत आते हैं ।

इत अछर को विलस्यो मन, पांच तत्व चौदे भवन ।

यामें महाविष्णु मन, मन थें त्रैगुन, ताथें थिर चर सब उतपन ।। (श्रीमुख वाणी- प्र. हि. ३७/२४)

इस मोह सागर के अन्दर अक्षर ब्रह्म के मन के स्वरूप अव्याकृत के मन ने प्रवेश किया, जिसके कारण यह पाँच तत्व तथा चौदह लोक का ब्रह्माण्ड बना । इसमें अव्याकृत का मन के स्वरूप महाविष्णु (क्षर पुरुष) बने और फिर इस के तीन गुणों से सदाशिव, ईश्वर, ब्रह्मा, विष्णु और शिव उत्पन्न हुए और उनसे ही यह सारा संसार बना है ।

नारायण की नाभि से कमल निकलता है और उससे ब्रह्मा प्रकट होते हैं । वह ब्रह्मा वेदों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता कहलाते हैं और संसार रूपी वृक्ष के बीज हैं । अहंकार को ही नाभि कहा गया है। कमल की नाल इच्छा शक्ति और कमल का फूल उनके मन का प्रतीक है । आदि नारायण के मन में जब यह इच्छा हुई कि मै अनेक हो जाऊँ, तो उससे अहंकार उत्पन्न हुआ, जिससे सभी देव, जीव और यह मिटने वाला संसार खड़ा हुआ ।

कालमाया के ब्रह्माण्ड में द्वैत की लीला है अर्थात् जीव (नारायण, त्रिदेव, देवी-देवता, मनुष्य, अन्य चराचर प्राणी) तथा प्रकृति (माया) की लीला है । इसमें जन्म-मरण , सुख-दुःख का चक्र चलता रहता है । अहंकार रूपी कड़ी जब तक नहीं छूटती, तब तक संसार झूठा होते हुए भी सच्चा लगता है और उसे कोई छोड़ना नहीं चाहता । जब तक जीव का अहंकार नष्ट नहीं होगा तब तक आवागमन का चक्र समाप्त नहीं हो सकता । अतः नारायण से लेकर जीवों तक यह सारी सृष्टि मोह (अज्ञान) रूप है । ब्रह्मज्ञान (तारतम) व प्रेम का मार्ग पकड़कर ही इस भवसागर को पार किया जा सकता है । 

जिसका प्रतिदिन क्षरण हो, उसे ही क्षर कहते हैं । इस क्षर ब्रह्माण्ड को ही हद , कालमाया , मोह जल , भवसागर , आदि नामों से भी जाना जाता है । जिस प्रकार नींद टूटने पर सपना टूट जाता है तथा स्वप्न के सभी दृश्य समाप्त हो जाते हैं , उसी प्रकार अक्षर ब्रह्म के मन (अव्याकृत) का स्वप्न टूटते ही सम्पूर्ण जगत महाप्रलय में लीन हो जाता है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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