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अक्षर ब्रह्म

क्षर से परे जो अविनाशी, अखण्ड, नूरमयी तत्व है, उसे अक्षर कहा जाता है ।

अछर सरूप के पल में , ऐसे कई कोट इंड उपजे ।

पल में पैदा करके , फेर वाही पल में खपे ।। (श्रीमुख वाणी- कि. ७४/२६)

अक्षर ब्रह्म के एक पल में करोड़ों ब्रह्माण्ड बनते और नष्ट हो जाते हैं ।

उस सर्वोत्पादक ब्रह्म (अक्षर ब्रह्म) ने द्यौ और पृथ्वी को दृढ़ता से स्थिर किया । उसने ही आनन्दमय लोक और उसने ही प्रकाशमय मोक्षधाम (योगमाया) धारण कर रखा है । उसने ही अन्तरिक्ष और लोक-लोकान्तरों को बनाया है । उसकी कृपा से विद्वान मोक्ष को प्राप्त करते हैं। (अथर्ववेद १३/१/७)

जो उत्पन्न हुआ, जो उत्पन्न होने वाला है और जो यह वर्तमान जगत है, इस सब के प्रति पुरुष (अक्षर ब्रह्म) ही अपना विक्रम दर्शा रहा है । सभी चराचर प्राणी तथा प्राकृतिक लोक इस पुरुष के एक पाद (चतुर्थ पाद मनस्वरूप अव्याकृत) के संकल्प से निर्मित हैं और इस पुरुष के तीन पाद (सबलिक, केवल, सत्स्वरूप) उत्पत्ति तथा विनाश से रहित अपने अखण्ड प्रकाशमय स्वरूप में विद्यमान रहते हैं । (ऋ. १०/९०/२, यजु. ३१/२, साम. आरण्यक ६/४/५)

अक्षर ब्रह्म जो इच्छा करते हैं, वही इच्छा सत् स्वरूप में आ जाती है । वही इच्छा केवल, सबलिक होते हुए मन के स्वरूप अव्याकृत में आ जाती है । उसी से सृष्टि की रचना होती है। अक्षर ब्रह्म का चौथा पाद अव्याकृत, इस प्राकृतिक जगत की उत्पत्ति का निमित्त कारण है । उसके संकल्प मात्र से उत्पन्न प्रकृति असंख्यों लोक-लोकान्तरों का निर्माण करती है । निमित्त कारण होने के कारण अव्याकृत ब्रह्म इस जगत से परे है । इस जड़ जगत में केवल उनकी सत्ता है, उनका स्वरूप नहीं । अतः अव्याकृत भी अखण्ड हैं।

अव्याकृत से परे अक्षर ब्रह्म के तीन पाद इस प्रकार हैं - सबलिक ब्रह्म (चित्त स्वरूप), केवल ब्रह्म (बुद्धि स्वरूप), सत्स्वरूप ब्रह्म (वास्तविक स्वरूप) । सबलिक ब्रह्म के सूक्ष्म में चिदानन्द लहरी नामक शक्ति विराजमान है जो माया और  त्रिगुण (आदि नारायण) का मूल स्थान है । शंकराचार्य जी ने 'सबलिक ब्रह्म' को ही पूर्ण ब्रह्म मानते हुए चिदानन्द लहरी को उनकी महारानी माना है (सौन्दर्य लहरी ग्रन्थ- श्लोक ९८) । सबलिक से परे 'केवल ब्रह्म' की नौ रसों वाली आनन्दमयी भूमि है (तैतरीयोपनिषद्) । इससे परे अक्षर ब्रह्म के अहं का स्वरूप 'सत्स्वरूप ब्रह्म' हैं । यह तीनों पाद अखण्ड, प्रकाशमय और सुखमय हैं । इन्हें ही वेद में त्रिपाद अमृत कहा गया है ।

अक्षर ब्रह्म की लीला के इस अखण्ड ब्रह्माण्ड को बेहद या योगमाया कहते हैं । यह ब्रह्माण्ड चैतन्य, अविनाशी है तथा इसके कण-कण में करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमय ब्रह्म का स्वरूप विद्यमान है । यहाँ अक्षर ब्रह्म के अन्तःकरण की अद्वैत लीला अखण्ड रूप से होती है । अक्षर ब्रह्म अपनी अभिन्न शक्ति स्वरूपा अखण्ड चैतन्य माया के साथ लीला करते हैं ।

अक्षर ब्रह्म का मूल स्वरूप इन चारों अखण्ड पादों से ऊपर है । वह सच्चिदानन्द परब्रह्म के सत् स्वरूप हैं तथा योगमाया से परे अखण्ड परमधाम में रहते हैं । अक्षर ब्रह्म का स्वरूप अखण्ड एक रस है । वह अनादि काल से जैसा था, वैसा ही अब भी है और अनन्त काल के पश्चात् भी वैसा ही रहेगा । उसके अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति में कभी भी कमी नहीं आ सकती । उसकी उपासना करके, साक्षात्कार करने वाले अविनाशी धाम को प्राप्त होते हैं । 

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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