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मक्का-मदीना से आये वसीयतनामे

ग्यारहवीं सदी (हिज़री) या सम्वत् १७३५ में साहिबुज्जमां इमाम महदी, अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने हरिद्वार के महाकुम्भ में हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों के आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित करके यह सिद्ध किया कि वह ही हिन्दू मान्यतानुसार कलियुग में प्रकट होने वाले विजयाभिनन्द बुद्ध हैं । तत्पश्चात् वे औरंगज़ेब की आत्मा को जागृत करने के लिए दिल्ली गए । इमाम महदी द्वारा औरंगज़ेब के पास संदेश लेकर भेजे गए १२ सुन्दरसाथ (मोमिन) को हिन्दू होने के कारण कठोर यात्नाएँ दी गईं ।

इसी दौरान क़ियामत के आने व आखरुल जमां इमाम महदी के प्रकट होने की साक्षी में मदीने की मस्जिद की दो मीनारें गिर पड़ी तथा वहां से वसीयतनामें लिखकर हिन्द के बादशाह औरंगज़ेब के पास आये । इन वसीयतनामों में लिखा था कि इमाम महदी हिन्द में ज़ाहिर हो गए हैं तथा ज़बराइल यहां से क़ुरआन (नूरी झण्डा) हिन्द में ले गया है । उन वसीयतनामों का हिन्दी अनुवाद यहां दिया जा रहा है ।

पहला वसीयतनामा

वसीयतनामा पहला, जो विक्रम संवत् १७१२ में और क़ुरआन की गिनती से हिज़री १०६४ में आया ।

शिर्क (गुनाह) व ज़ुल्म और सितम फैल बुरे फितने दज्जाल के से बीच इस साल के है । चार लाख ग्यारह हज़ार मुसलमान बेइमान हो गये हैं । बीच किसी के भी निशानी ईमान की न रही, और बहुत निशानियां क़ियामत की और फैल बुरे के से ऊपर तुम्हारे ज़ाहिर आयी । और ज़हूर ईसा अलैहिस्सलाम का भी नज़दीक आ पहुँचा है । आगे इससे सुनेंगे । चाहिए कि तोबा करो और खुदाय से पनाह माँगो ।

दूसरा वसीयतनामा

दूसरा वसीयतनामा वि. सं. १७३२-३३ में आया और क़ुरआन की गिनती से हिज़री १०८६ में आया ।

इस भांति से कि बीच इस साल के चार लाख और नव हज़ार आदमी बेइमान होकर मरे, कि ऊपर निहायत सख्ती उसके कि ज़माना नज़दीक इमाम महदी का आ पहुँचा । यह मेरा तांई लिए हुक्म मुहम्मद महदी का है । और भी नज़दीक है, कि दरवाज़ा तौबा का बन्द होता है । उस सबब से दस खशलते बुरी ज़ाहिर होने की निशानी क़ियामत के ऊपर जात तुम्हारी के ज़ाहिर आयी ।

तीसरा वसीयतनामा

तीसरा वसीयतनामा वि. सं. १७३५ में आया और क़ुरआन की गिनती से हिज़री १०९० में आया ।

कि बीच इस हफ्ते के इस ज़ुमां से ले तो उस ज़ुमां (तक तांई) बहुत सख्ती उस फितने के से ७०,००० आदमी मेरी उम्मत में से बेइमान हो गये । उसमें से छूट केवल सात आदमी और कोई भी ईमान से सलामत न रह गया । इस सबब से कि दरगाह हक़ तआला की से खिताब आया कि ऐ मुहम्मद ! तेरी उम्मत गुनाहों के कहर से और ज़ुल्म से नहीं डरती । तुझे सौगन्ध इज़्जत और ज़लाल अपने की है । अब तुमसे सूरतें इनों की बदलता हूँ । उस वक्त पैगम्बर सल्लिलाहो अलैहि वसल्लम ने आज़िजी और जारी नियाज सत याने अर्जी की कि ऐ बख़्शने वाले और रहम करने वाले ! इस वक्त अपना कहर इनों से फेर रख । मैं वसीयतनामा फिर भेजता हूँ । उन्हें चाहिए कि तेरे गज़ब से डरें और इन्साफ में यानि सच में आवें । चाहिए कि मेरी उम्मत इन फैल नालायक से डर के चंगुल बीच दीन खुदाय के मरे कि कहर व गुनाह तुम्हारे के से नहीं । जानता हूँ, कि तुम्हारी सिफायत फेर करावेगा । कि गज़ब खुदाय का आ पहुँचा । कि तमाम होने को सदी अग्यारहीं की है । ज़िबरील नाज़िल हुआ कि बरकत दुनिया की, शफ़कत फकीरों की और क़ुरआन मज़ीद को इस ज़हान से उठाये के अपने मकान को ले गया । और दरवाज़ा तौबा का बन्द होता है । सो खादिमान दरगाह के ऊपर साबित उस बात की सौगन्ध सख्त खाय के लिखा है कि हम यह बात हुक्म मुहम्मद मुस्तफा स. के से और इमाम मुहम्मद महदी के से लिखते हैं । अगर हमने झूठ आपसे लिखा होय तो दोनों ज़हान में हमारा मुंह स्याह होय और खुदाये के दीदार से और मुहम्मद स. की सिफायत से महरूम रहें और जो इसे साँच करके न माने और ऐतबार न करे, तो बस वही काफ़िर है ।

चौथा वसीयतनामा

तीन वसीयतनामों में दीन के निशान की खबर नहीं पायी थी, सो खबर इस दीन के निसान की पीछे इस बरस के बीच दीन आखिर सदी अग्यारहीं के वसीयतनामा चौथा आखिर के से बीच हिज़री १०९० और १०९९ के आया है, लगबग वि. सं. १७३५ ।

मालूम और समझा गया कि हिसाब आखिरत का बीच हिन्दुस्तान के होवे । ए हुक्म खुदाय का और रसूल का हुआ कि संवारने इस काम को आगे से ही लेने तमीज़ हिसाब उम्मत का (१०१) देव तैनात हिन्दुस्तान के हुए है । हुक्म खुदाय का तीन रात तीन दिन बीच तमाम खलक के चलावे । और तमाम होने सदी अग्यारहीं के मेहेतर ज़िबरील नाज़िल होए बरकत दुनिया की और सफ़कत फकीरों की और क़ुरआन मज़ीद को इस ज़हान से उठाय के अपने मकान को ले जाय और दरवाज़ा तौबा के बन्द हो जाय ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा