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हरिद्वार का शास्त्रार्थ

जब श्री प्राणनाथ जी विक्रम सम्वत् १७३५ में हरिद्वार के महाकुम्भ में पहुँचे, तो उसमें हिन्दू धर्म के सभी पंथों के अनुयायी एवं आचार्य आए हुए थे, जिनमें चारों वैष्णव सम्प्रदाय, षट दर्शनी एवं दसनाम सन्यासी मुख्य थे । श्री जी एवं सुन्दरसाथ को सबसे भिन्न प्रकार की साधारण वेश-भूषा में देखकर सभी सम्प्रदायों के आचार्यों के मन में उनके प्रति संशय हो गया कि ये नये मत वाले कौन हैं ? श्री जी ने उन आचार्य जनों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आपके सम्प्रदाय अति प्राचीन हैं । आप अपने मत के अनुसार जीव की मुक्ति के विषय में बताइए । क्रोध एवं अहंकार को छोड़कर सच्चे दिल से हमे अपना ज्ञान समझाइए । वेद-शास्त्रों के वास्तविक प्रमाणों से अपने सिद्धान्त को बताकर हमारे संशयों को दूर कीजिए, ताकि हम भी आपके सम्प्रदाय के सिद्धान्त को ग्रहण कर लेवें ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा