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ब्रज एवं रास लीला

परब्रह्म की तरह आत्मा भी गर्भवास नहीं करती है । अतः परमधाम (दिव्य ब्रह्मपुर धाम) से ब्रह्मसृष्टियों की सुरता अपने मूल परात्म के तनों को छोड़कर ब्रज में युवा गोपियों के तनों में बैठ गई ।

पुराण संहिता के अध्याय २६ श्लोक ८०,८१,८२ में इस तथ्य का सुन्दर वर्णन है-                             बारह हजार सखियां, जो अक्षरातीत की अंगना हैं, माया का खेल देखने की इच्छा से इनकी मनोवृत्ति (सुरता) गोकुल में गई । वे गोपों के घरेलू कार्यों को करती हुई वहीं स्थित हो गईं । तथा माया जनित मिथ्या धारणा के अधीन होने के कारण अपने वास्तविक स्वरूप की खोज से रहित हो गईं । मूल मिलावा में विराजमान अक्षरातीत की वे प्रियायें अपने स्थानों पर बैठी ही रहीं । अक्षरातीत के सामने समूहबद्ध बैठी हुईं ही वे सपने के खेल में मोहित हो गईं ।

इस प्रकार उन प्रियाओं को अपने सामने नश्वर जगत क��� मोह में डूबा हुआ देखकर अति कृपालु अक्षरातीत ने भी वहां जाने के लिए अपने मन में धारणा बना ली । (पु. सं. २६/९७)

कूटस्थ अक्षर ब्रह्म की चित्तवृत्ति में अपना आवेश स्थापित करके पुरुषोत्तम अक्षरातीत नन्द के घर प्रकट हुए । (पु. सं. ३१/१२,१३)

इस प्रकार ११ वर्ष ५२ दिन तक श्री कृष्ण जी के तन में विराजमान अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने आत्मा स्वरूपा गोपियों के साथ प्रेम लीला की । इसी काल में कंस द्वारा भेजे गए पूतना, अघासुर, बकासुर, आदि राक्षसों का भी वध किया । ११ वर्ष की प्रेममयी लीला के पश्चात् ५२ दिन की विरह लीला हुई । तत्पश्चात् महारास की लीला के लिए उन्होंने योगमाया के ब्रह्माण्ड में प्रवेश किया । योगमाया का वह ब्रह्माण्ड इस नश्वर जगत से पूर्णतया अलग है, जिसमें चेतनता, अखण्डता तथा प्रकाशमयी शोभा है । उसमें लक्ष्मी के मुख के समान सुन्दर पूर्णमासी का अखण्ड स्वरूप वाला चन्द्रमा उगा हुआ है, जिसकी कोमल किरणों से सम्पूर्ण नित्य वृंदावन सुशोभित है । अक्षरातीत के आवेश ने अति सुन्दर स्वरूप धारण कर बांसुरी बजाई ।

उस मधुर ध्वनि को सुनकर कालमाया के ब्रह्माण्ड की गोपियां अपने-अपने तनों को छोड़कर योगमाया के ब्रह्माण्ड में पहुंची और अलौकिक तन धारण कर अपने प्रियतम के साथ ब्रह्मानन्दमयी रास लीला की । रास लीला के मध्य विरह की भी अनुभूति कराकर अक्षर ब्रह्म की आत्मा को भी परब्रह्म ने यह बता दिया कि वे योगमाया के ब्रह्माण्ड में परमधाम वाली लीला ही देख रहे थे । पुनः अक्षरातीत ने आवेश स्वरूप प्रकट कर रासलीला करके दोनों को आनन्दित किया ।

पुनः आत्माओं की इच्छा पर परब्रह्म उन्हें परमधाम ले गए, जहां वे अपने मूल तनों में जागृत हो गयीं । अक्षर ब्रह्म की चित्तवृत्ति भी अपनी परात्म में जागृत हुई । ब्रह्मसृष्टियों की माया देखने की इच्छा अभी पूरी न हो सकने के कारण उन्हें पुनः इस नश्वर जगत (अट्ठाइसवें कलयुग) में आना पड़ा । इस ब्रज-रास एवं जागनी लीला में अक्षर ब्रह्म की सुरतायें भी साथ-साथ रही हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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