Shri Prannath Gyanpeeth-     मासिक पत्रिका आर्थिक सेवा सम्पर्क करें
                                                                 




मुख्य संस्था अध्यात्म निजानन्द दर्शन विजयाभिनन्द बुद्ध ब्रह्मवाणी (तारतम) चितवनि महान व्यक्तित्व साहित्य प्रवचनमाला सुन्दरसाथ
कलियुग में प्रकटन
     परब्रह्म अक्षरातीत व उनकी आत्माओं का
     आनन्द अंग श्री श्यामा जी की लीला »
          श्री देवचन्द्र जी का जन्म 
          आध्यात्मिक खोज 
          कठोर साधना व निष्ठामय जीवन 
          श्री निजानन्द स्वामी के रूप में शोभा 
     श्री इन्द्रावती जी की लीला » 
          श्री मिहिरराज का जन्म 
          साधनामय जीवनारंभ  
          अक्षरातीत श्री प्राणनाथ के रूप में शोभा 
          जागनी अभियान 
          सूरत की बीतक 
          सिद्धपुर व मेड़ता में जागनी 
          विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में सुशोभित 
          औरंगज़ेब को जाग्रत करने का प्रयास 
          औरंगाबाद व रामनगर के प्रसंग 
          श्री पन्ना जी की बीतक 
 
 
 
  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  कलियुग में प्रकटन  »  श्री इन्द्रावती जी की लीला  »  जागनी अभियान

जागनी अभियान

अब श्री प्��ाणनाथ जी परमधाम की आत्माओं को जागृत करने हेतु देश-विदेश में भ्रमण करने लगे । यात्रा की कठिनाइयां होते हुए भी भारतवर्ष के कई प्रान्तों गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, सिन्ध प्रान्त तथा अरब देशों में भी उन्होंने परमधाम के अलौकिक ब्रह्मज्ञान का रस बरसाया ।

सर्वप्रथम विक्रम सम्वत् १७१८ में उन्होंने जूनागढ़ के शास्त्रार्थ महारथी 'हरजी व्यास' को अपने अलौकिक ज्ञान से नतमस्तक किया । हरजी व्यास भागवत के इस एक प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके कि अक्षर ब्रह्म का वह अखण्ड निवास (महल) कहां है ?

इसके पश्चात् श्री प्राणनाथ जी दीप बंदर, कच्छ मंडई, कपाइये, भोजनगर में अनेक आत्माओं को जागृत करते हुए ठट्ठानगर (कराची) आये । वहाँ भी श्री जी की अमृतमयी वाणी गूँज उठी । धर्म जिज्ञासुओं की भीड़ बढ़ने लगी तथा बहुत लोगों ने तारतम लिया ।

ठट्ठानगर में श्री जी ने कबीरपंथ के गादीपति आचार्य चिन्तामणि जी से चर्चा की, जो बहुत बड़े योगाभ्यासी थे । उनके पास १००० शिष्यों का समूह भी था । चिन्तामणि ने कहा कि मैं आपको चतुर्भुज स्वरूप विष्णु भगवान, आदि नारायण या ज्योति स्वरूप का दर्शन करा सकता हूँ । किन्तु यदि आपका ज्ञान श्रेष्ठ है तो मुझे सुनाइये । वार्ता के दौरान कबीर जी की एक साखी का अर्थ करते हुए उन्होंने कहा कि कबीर जी से बड़े भक्त तो उनके पुत्र कमाल थे ।

श्री प्राणनाथ जी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि कबीर जी तो अक्षर ब्रह्म की पांच वासनाओं, जो इस संसार में अवतरित हुईं, उनमें से एक हैं । आपको तो उनके स्वरूप की पहचान ही नहीं है । सच तो यह है कि कबीर जी अक्षर ब्रह्म का ज्ञान रखते थे, परन्तु माया का तन होने के कारण उन्हें माया का आधा भक्त कहा गया है तथा कमाल ब्रह्मज्ञान से रहित होने के कारण माया के पूरे भक्त हैं । तत्पश्चात् श्री जी ने कबीर वाणी उद्घृत करते हुए ऐसे रहस्यमयी पद्यों का अर्थ कर दिया कि चिन्तामणि सन्न रह गये ।

चिन्तामणि ने अपने शिष्यों से स्पष्ट कहा कि उनके गुरुदेव कह गये थे कि जो व्यक्ति कबीर जी के इस शब्द (पद्य) का अर्थ बतायेगा, वह अलौकिक ब्रह्मस्वरूप होगा । तत्पश्चात् वह प्रतिदिन श्री जी की चर्चा सुनने आने लगे । अब उन्हें श्री प्राणनाथ जी के वास्तविक स्वरूप तथा अपने आत्मिक स्वरूप की पहचान हो गई । चिन्तामणि अपने हजार शिष्यों सहित श्री जी के चरणों में समर्पित हो गये तथा तारतम ग्रहण कर लिया ।

इसके पश्चात् सेठ लक्ष्मण दास की आत्मा भी जागृत हुई जिनका ९९ जहाजों से व्यापार चलता था । लक्ष्मण दास भागवत के विद्वान थे । चतुर दास नामक ब्राह्मण प्रतिदिन श्री प्राणनाथ जी की चर्चा सुनता था । उसने लक्ष्मण दास से प्रश्न किया कि ब्रज और रास कहाँ पर तथा कैसे अखण्ड हैं ? सेठ लक्ष्मण दास ने उत्तर दिया कि वे इसी ब्रह्माण्ड में अखण्ड हैं, किन्तु दिव्य दृष्टि मिलने पर ही दिखाई दे सकते हैं । जब पांच तत्व और तीन गुण वाले ब्रह्माण्ड का महाप्रलय में नाश हो जायेगा, तो वे कहाँ अखण्ड रहते हैं ? लक्ष्मण दास जी इसका उत्तर नहीं दे सके । तब उन्होंने जिज्ञासावश श्री जी से भेंट की और प्रतिदिन चर्चा सुनने जाने लगे ।

सेठ लक्ष्मण दास चर्चा तो सुनते थे पर उन्हें श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की वास्तविक पहचान नहीं थी । तब जिन्दादास ने उन्हें 'मार्कण्डेय का दृष्टान्त' सुनाया-              

सरोवर के किनारे अपने आश्रम में तप करते-करते मार्कण्डेय ऋषि को नारायण के दर्शन हुए । ऋषि ने माया देखने की इच्छा प्रकट की । अतः नारायण ने उनके ऊपर अज्ञान रूपी नींद का आवरण डाला । मार्कण्डेय ऋषि ने देखा कि प्रलय के जल में एक बालक बह रहा है । उनकी सुरता उसमें चली गयी । वहां अनेक योनियों में उन्होंने अनेक तन धारण करते हुए सांसारिक क्रिया कलापों में बहुत दुःख भोगा तथा माया में तल्लीन हो गये । तभी साधु भेष में नारायण ने उनसे भेंट की और उनको प्रबोधित किया कि वे तो मार्कण्डेय ऋषि हैं । अज्ञान रूपी नींद के हटते ही उन्होंने पाया कि वे उसी सरोवर के किनारे बैठे हैं तथा नारायण उनके सामने विराजमान हैं । अर्थात् अभी एक क्षण भी व्यतीत नहीं हुआ था ।

जिस प्रकार मार्कण्डेय ऋषि ने माया देखने की इच्छा की थी, उसी प्रकार अनादि परमधाम में ब्रह्मआत्माओं ने अक्षरातीत परब्रह्म से माया देखने की इच्छा की थी । उनकी इच्छा पूरी करने के लिए सच्चिदानन्द परब्रह्म ने अपनी आत्माओं को वहां बैठे-बैठे दृष्टि (सुरता) मात्र से यह मायावी खेल दिखाया है । परमधाम की आत्मायें इस मायावी जगत में अपने प्राणवल्लभ अक्षरातीत को भूल गयी हैं । उनको जागृत करने के लिए स्वयं परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी मिहिरराज के तन में पधारे हैं ।

श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पहचान होते ही श्री लक्ष्मण दास की स्थिति बदल गई । उन्होंने श्री जी के चरणों में समर्पण करते हुए तारतम ग्रहण किया । श्री लक्ष्मण दास जी ही बाद में श्री लालदास जी के रूप में प्रसिद्ध हुए ।

इसके पश्चात् श्री प्राणनाथ जी अरब देशों में गये, जहां उन्होंने मस्कत बन्दर तथा अबासी बन्दर में सैंकड़ों आत्माओं को जागृत किया । अबासी बन्दर में धन, मांस और शराब में डूबे रहने वाले भैरव ठक्कर जैसे व्यक्ति ने भी श्री जी की कृपा दृष्टि से परब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा