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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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     श्री प्राणनाथ जी का वाङमय कलेवर 
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सिनगार

सिनगार ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७४७ में श्री पन्ना धाम में हुआ । हिन्दुस्तानी भाषा में अवतरित यह ग्रन्थ अक्षरातीत श्री राज जी के श्रृंगार पर बृहत् रूप से प्रकाश डालने वाला है ।

संसार के सभी ऋषि-मुनि तथा देवी-देवता जिस परब्रह्म को खोजते-खोजते हार गए और न मिलने पर शब्दातीत कहकर चुप हो गए, उन्हीं अक्षरातीत के स्वरूप की शोभा व श्रृंगार का इस ग्रन्थ में कई बार वर्णन किया गया है । तेज व प्रेम से सुशोभित पूर्ण ब्रह्म का नख से लेकर शिख तक विस्तृत वर्णन है, जिसे पढ़ने वाला धन्य-धन्य हो जाता है । अध्यात्म का यह सर्वेच्च ज्ञान अक्षर ब्रह्म की जागृत बुद्धि से भी परे है, तो संसार के ऋषि-मुनियों तथा त्रिदेव की तो कल्पना भी इस तक नहीं पहुँच सकती ।

यह ग्रन्थ श्री जी के वाङमय कलेवर का मुखारविन्द है । मुख ही दिल का दर्पण होता है । अक्षरातीत के हृदय में जो अनन्त सागर लहरा रहे हैं, उनका प्रकट रूप मुखारविन्द की शोभा में देखा जा सकता है । उसकी झलक इस ग्रन्थ द्वारा हमें इस संसार में मिल रही है ।

सिनगार ग्रन्थ की वाणी ब्रह्मसृष्टियों (आत्माओँ) के लिए मारिफत (परम सत्य) का द्वार खोलती है । इसके बिना धाम धनी अक्षरातीत के दिल में बैठकर उनके सागरों के गुह्य रहस्यों को नहीं जाना जा सकता । श्री राज जी के हृदय के जिन भेदों को परमधाम से लेकर आज तक जाना नहीं जा सका था, वह सब इस ग्रन्थ में निहित हैं ।

इस ग्रन्थ में निहित ज्ञान को आत्मसात करके ब्रह्ममुनियों ने अध्यात्म जगत की सर्वोच्च मंजिल को प्राप्त कर लिया।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री सिनगार के सरल भाष्य को पढ़ें)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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