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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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सिंधी

सिंधी ग्रन्थ का अवतरण श्री पन्ना धाम में हुआ । यह ग्रन्थ सिंधी भाषा में है, अतः इसका नाम भी 'सिंधी' ही रखा गया है । इसमें आत्मा का अपने प्रियतम अक्षरातीत के प्रति प्रेम दर्शाया गया है ।

इस ग्रन्थ में परमात्मा से आत्मा (श्री इन्द्रावती) की प्रेममयी नोंक-झोंक (वार्ता) का अति सुन्दर वर्णन है, जिससे उनकी निसबत (सम्बन्ध) का ज्ञान होता है । इस संसार के ज्ञानीजन परमात्मा को ठीक से जाने बिना नवधा भक्ति व कर्मकाण्ड में व्यस्त रहते हैं, जबकि परमधाम की आत्मा परमात्मा की साक्षात् तन हैं । इस ग्रन्थ में वर्णित वार्ता उनके प्रेममयी अखण्ड सम्बन्ध का ही परिचायक है ।

सिंधी वाणी प्रेम के रस से सराबोर है । इसे पढ़कर यह ज्ञात होता है कि किस प्रकार आत्मा अपने प्रियतम सच्चिदानन्द से अधिकारपूर्वक प्रेम व आनंद की मांग करती है । यह अधिकार पूर्ण समर्पण से प्राप्त होता है । इसके अवलोकन से यह भी पता चलता है कि परमधाम में आत्मा व धाम धनी श्री राज जी का स्वरूप व शोभा समान है । उनके बीच चलने वाली प्रेममयी लीला की गहराई का भी आभास होता है ।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री सिन्धी के सरल भाष्य को पढ़ें)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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