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श्री सुन्दरसाथ
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  सुन्दरसाथ  »  प्रणामी धर्म

प्रणामी धर्म-

निम्न वर्णित सभी प्रश्नों पर सुन्दरसाथ गम्भीरता से विचार करें । एक स्वतंत्र विचारधारा वाले मस्तिष्क में इन संशयों का उठना स्वाभाविक है । इन प्रश्नों का उचित समाधान खोजे बिना, दुविधा से ग्रस्त सुन्दरसाथ कभी भी उच्चतम आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त नहीं कर सकता ।

क्या श्री कृष्ण अक्षरातीत हैं ?

श्री कृष्ण की त्रिधा लीला सभी सुन्दरसाथ में प्रचलित है । सभी जानते हैं कि श्री कृष्ण नामक तन में तीन प्रकार की शक्तियों ने अलग-अलग काल में लीला की । परन्तु यहाँ पर हम केवल अक्षरातीत की लीला की चर्चा करेंगे ।

सबसे पहले इस नश्वर ब्रज में ११ वर्ष और ५२ दिन तक श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) के आवेश तथा अक्षर ब्रह्म की आत्मा ने श्री कृष्ण तन (जीव श्री विष्णु) पर बैठकर लीला की । नाम से केवल शरीर की पहचान होती है, जीव भी उससे परे रहता है क्योंकि वह हर जन्म म���ं नये नाम के तन पर बैठता है । अन्दर गुप्त रूप से कार्य कर रही अक्षरातीत की शक्ति का नामकरण तो कदापि नहीं हो सकता । लीला के पश्चात् जब वे शक्तियां चली गईं तो श्री कृष्ण व गोपियों के तन मृत्यु को प्राप्त हो गये । फिर ब्रह्माण्ड का प्रलय हो गया ।

फिर अखण्ड योगमाया में पुनः नये तन धारण करके रास की लीला होती है । इस बार भी श्री कृष्ण के तन में श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) का आवेश तथा अक्षर ब्रह्म की आत्मा लीला करती है । इस बार एक रात्रि की लीला के पश्चात् सभी शक्तियां चली गयीं, परन्तु वे तन जैसे-के-तैसे बने रहते हैं । अक्षर ब्रह्म की इच्छा पूरी करने के लिए श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) ने ब्रज की बाल लीला को भी योगमाया की पाँचवी बहिश्त (अखण्ड गोलोक) में अखण्ड कर दिया । इस प्रकार श्री कृष्ण (विष्णु भगवान) के जीव को मुक्ति मिल गयी तथा ब्रज के अन्य प्राणियों के जीवों को भी अखण्ड ब्रज में मुक्ति मिल गयी ।

योगमाया व परमधाम शब्द से परे हैं, अतः वहाँ नाम नहीं चलते । परन्तु पहचान के लिए हम अखण्ड गोलोक (योगमाया) में विराजमान बाल मुकुन्द व बांके बिहारी को श्री कृष्ण नाम से पुकारते हैं । परमधाम में विराजमान अक्षरातीत स्वरूप का कुछ भी नाम नहीं है । उस सच्चिदानन्द स्वरूप को सम्बोधनात्मक या गुणात्मक शब्दों से जाना जाता है जैसे प्राणनाथ, राज, धाम धनी, आदि । अतः जब हम श्री कृष्ण नाम पुकारते हैं, तो वह योगमाया में विराजमान गोलोकी कृष्ण तक पहुँचता है क्योंकि यह नाम उनकी पहचान है ।

जब श्री देवचन्द्र जी (श्री श्यामा जी) परमात्मा की खोज कर रहे थे, तो उन्होंने हरिदास जी से दीक्षा ली । हरिदास जी ने उन्हें श्री कृष्ण भक्ति का मार्ग दिखाया । अपने आत्मिक स्वरूप की पहचान न होने के कारण अज्ञानतावश वे इस मार्ग पर चल पड़े । परन्तु जब वे श्री कृष्ण की मूर्ति को सेवा करने के लिए घर ले जाना चाहते थे तो वह मूर्ति अदृश्य हो गई । बाद में गोलोकी श्री कृष्ण ने हरिदास जी को दर्शन देकर कहा- "मै इनकी सेवा सहन नहीं कर सकता हूँ क्योंकि यह अखण्ड परमधाम की आत्मा हैं । इनकी कृपा से ही मुझे मुक्ति मिली है ।" इन कथनों से यह स्पष्ट है कि श्री कृष्ण गोलोक (योगमाया) तक ही सीमित हैं तथा परमधाम में विराजमान स्वरूप उनसे श्रेष्ठ व परे है । 

जब श्री देवचन्द्र जी को जामनगर के श्याम जी मंदिर में दर्शन होते हैं तो वे दर्शन देने वाले के स्वरूप को पहचान ही नहीं पाये । जिन श्री कृष्ण की उन्होंने जीवनभर भक्ति की, उन्हे वे पहचान क्यों नहीं सके ? ऐसा इसलिए क्योंकि वे श्री कृष्ण थे ही नहीं । श्री कृष्ण तो पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि वे देवचन्द्र जी की कृपा पर आश्रित हैं । यदि परमधाम में विराजमान उनके प्रियतम श्री कृष्ण ही होते तो वे उसी वेशभूषा में दर्शन देते, जिसे देवचन्द्र जी तुरन्त पहचान लेते । परमधाम की श्यामा जी जीवन भर अपने प्रियतम अक्षरातीत को श्री कृष्ण नाम से ढूँढती रहीं, परन्तु परमधाम का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ । अन्ततः धाम धनी श्री प्राणनाथ जी (राज जी) ने कृपा करके उन्हें दर्शन व तारतम ज्ञान दिया । 

यदि श्री कृष्ण ही अक्षरातीत होते तो वे उसी नाम से कलियुग में सारे संसार में जाहेर होते । फिर विजयाभिनन्द बुद्ध व इमाम महदी के रूप श्री प्राणनाथ जी ही क्यों जाहेर हुए ?

उपर्युक्त दृष्टांतों से यह स्पष्ट होता है कि श्री कृष्ण नाम से की गई भक्ति गोलोक तक ही पहुँचती है । परमधाम में श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) विराजमान हैं ।

क्या श्रीमद्भागवत् परमधाम का ज्ञान है ?

कदापि नही । श्री प्राणनाथ जी द्वारा अवतरित श्री मुख वाणी (श्री कुलजम स्वरूप) के अतिरिक्त अन्य सभी ज्ञान स्वप्न की बुद्धि से रचित हैं । श्री मुख वाणी के अवतरण से पहले संसार के किसी भी ग्रन्थ की पहुँच निराकार से परे की नहीं है । जब श्री प्राणनाथ जी (राज जी) ने संसार में आवेश द्वारा आने का मन बनाया, तो अपने आने की भविष्यवाणी सभी धर्मग्रन्थों में ज़बराइल फरिश्ते के माध्यम से संकेत में लिखवा दी ।

श्रीमद्भागवत् में कुछ भी ब्रह्मज्ञान नहीं है । जब सुकदेव मुनि ने योगमाया की रास का वर्णन करना चाहा, तो राजा परिक्षित ने उन्हें टोक दिया । तब जाते-जाते ज़बराइल फरिश्ते ने कृपा करके संक्षेप में रास लीला का कुछ वर्णन करवा दिया । दशम् अध्याय में पाँच प्रकरणों में वह वर्णन है, जिसे श्रीमद्भागवत् का सार कहा जा सकता है । जबकि श्री कुलजम स्वरूप में तो स्वयं सच्चिदानन्द की आवेश शक्ति द्वारा रास पर एक बृहद विस्तृत ग्रन्थ अवतरित है । ऐसे में भागवत ग्रन्थ की क्या महत्ता है ?

ऐसा कहा जाता है कि जब श्री देवचन्द्र जी चौदह वर्ष भागवत का ज्ञान लेते रहे, तो सुन्दरसाथ ऐसा क्यों न करें ? श्री देवचन्द्र जी के अन्दर परमधाम की श्यामा जी का आत्मा थी । सच्चिदानन्द स्वरूप श्री श्यामा जी कभी भी परमधाम से कम किसी भी ज्ञान से संतुष्ट नहीं हो सकती । भागवत के लिखने वाले तो त्रिधा लीला से भी अपरिचित थे, तो फिर वे परमधाम का ज्ञान कहाँ से प्रस्तुत करते ? अपने प्रियतम अक्षरातीत की खोज करने के उद्देश्य से देवचन्द्र जी ने भागवत कथा का श्रवण किया । यदि भागवत में परमधाम का ज्ञान होता तो वे अवश्य श्री राज जी व अपने स्वरूप की पहचान कर लेते । परन्तु ऐसा नहीं हुआ । जब उन्हें दर्शन मिला, तब वे न तो राज जी को पहचान सके, न ही अपनी पहचान बता पाये । यदि श्रीमद्भागवत् में परमधाम का ज्ञान होता तो तारतम ज्ञान लाने की क्या आवश्यकता थी ?

श्री मुख वाणी ब्रह्मज्ञान का सूर्य है । जब सूर्य ही उदय हो गया तो दीपक की क्या आवश्यकता ? जो सुन्दरसाथ तारतम ज्ञान छोड़कर भागवत पर समर्पित हैं, वे अवश्य ही अमृतधारा को छोड़कर रेगिस्तान में भटक रहे हैं । क्या वे सच में श्री निजानन्द सम्प्रदाय के अनुयायी हैं ?

श्री कृष्ण प्रणामी सम्प्रदाय किसका है ?

सम्वत् १७३५ में हरिद्वार के शास्त्रार्थ में श्री प्राणनाथ जी ने सभी सम्प्रदाय के आचार्यों को पराजित करके 'श्री निजानन्द सम्प्रदाय' का विजय ध्वज लहराया था । उन्होंने माहेश्वर तन्त्र व अन्य ग्रन्थों से अपनी पद्धति सिद्ध की थी । बुद्ध जी का शाका चलाया गया । फिर इस मार्ग का नाम बदलकर 'श्री कृष्ण प्रणामी सम्प्रदाय' किसने रख दिया ? निजानन्द सम्प्रदाय के संस्थापक तो सदगुरु श्री देवचन्द्र जी हैं, परन्तु कृष्ण प्रणामी सम्प्रदाय का संस्थापक कौन है ?

ऐसी मान्यता है कि सम्वत् १९९२ के आसपास नेपाल के धरान में सनातन मत के विद्वानों से हुए शास्त्रार्थ में अपना मार्ग सिद्ध करने के लिए श्री कृष्ण प्रणामी धर्म की नींव रखी गई । क्या इससे पहले किसी ने 'कृष्ण प्रणामी' शब्द सुना भी था ? क्या कुछ विद्वानों के विचारों का अन्धानुसरण करना सभी सुन्दरसाथ के लिए उचित है ? क्या हम अपनी असली पहचान, जो सदगुरु श्री देवचन्द्र जी तथा श्री प्राणनाथ जी ने दी थी, उसे भुला दें ? क्या कृष्ण प्रणामी सम्प्रदाय व निजानन्द सम्प्रदाय भिन्न-भिन्न हैं ? यदि नहीं, तो फिर श्री देवचन्द्र जी तथा श्री प्राणनाथ जी द्वारा चलाये गये निजानन्द सम्प्रदाय से अलग एक नया नाम प्रचलित करने की क्या आवश्यकता है ? वल्लभ सम्प्रदाय (श्री कृष्ण की बाल व किशोर लीला को मानने वाले) के सिद्धान्तों को अनुसरण करके श्री कृष्ण प्रणामी समाज कहीं परमधाम के मार्ग से भटक तो नहीं रहा ?

जब सदगुरु श्री देवचन्द्र जी इस मार्ग पर चलने वालों को 'सुन्दरसाथ' कहते थे, तो फिर प्रणामी किसे क���ते हैं ? यदि वे भी सुन्दरसाथ ही हैं, तो सभी मिलकर क्यों नहीं रहते, अलग पहचान बनाने की क्या आवश्यकता है ?

वाणी का कथन सर्वोपरि है । जब उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा तो हम गलत मार्ग पर क्यों चलें ?

श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर किसका है ?

श्री निजानन्द सम्प्रदाय के सभी मंदिरों में श्री प्राणनाथ जी द्वारा अवतरित श्री कुलजम स्वरूप वाणी का ही पूजन किया जाता है । मूर्तिपूजा निषेध है । श्री मुख वाणी को श्री जी का ज्ञानमय स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है ।

प्रत्येक मंदिर का नाम उसके इष्ट के नाम पर होता है, उदाहरणार्थ- राम मंदिर में राम की पूजा होती है, हनुमान मंदिर में हनुमान की पूजा होती है, आदि । जब सच्चिदानन्द स्वरूप श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) ही हमारे आराध्य हैं, उनकी वाणी की ही हम पूजा करते हैं, तो फिर मंदिर का नाम 'श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर' क्यों ?

हमारा धर्म क्या है ?

हम जन्म तथा शरीर से हिन्दू हैं तथा सदा रहेंगे । परन्तु क्या ज्ञान भी हिन्दू या मुसलमान होता है ? क्या आत्मा हिन्दू या मुसलमान होती है ? क्या परमात्मा हिन्दू या मुसलमान होता है ? सम्प्रदाय और भाषा तो मानव की रचना है ।

जब श्री मुख वाणी में दोनों हिन्दू व मुस्लिम पक्ष का ज्ञान अवतरित हुआ है, तो इसका सीधा अभिप्राय है कि भाषा का भेद न करके हमें वास्तविक ज्ञान को ग्रहण करना है । ब्रह्मज्ञान किसी भी भाषा में हो, सदैव आदरपूर्वक ग्रहण करना चाहिए ।

परमधाम की आत्मा हिन्दू तन में आये अथवा मुस्लिम तन में, वह सदैव अक्षरातीत का तन रहेगी । श्री देवचन्द्र जी व प्राणनाथ जी ने भी कितनी मुस्लिम तन में विराजमान आत्माओं को जगाया था । अतैव सदा आत्मिक स्वरूप ही महत्वपूर्ण होता है, शरीर या सम्प्रदाय नहीं और आत्मा का प्रमुख धर्म है अपने प्रियतम प्राणनाथ पर प्रेमपूर्वक समर्पण करना ।

निष्कर्ष-

श्री मुख वाणी को श्री प्राणनाथ जी का ज्ञानमय स्वरूप माना जाता है । वाणी का कथन सर्वोपरि है । अतः अच्छा यही है कि हम अपने सभी व्यक्तिगत संशयों से लेकर समाज की समस्याओं का निवारण वाणी के कथनों के आधार पर करें । सुन्दरसाथ का प्रथम धर्म है कि किसी दबाव में आये बिना हम वाणी की मान्यताओं पर चलकर दिखायें, उसके विपरीत कोई भी कार्य न करें । किसी भी व्यक्ति का कथन वाणी से ऊपर नहीं है । अतः वाणी के निर्देशन में सभी बातों का समाधान किया जाना चाहिए ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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