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आध्यात्मिक खोज

जब ��्री देवचन्द्र जी की आयु १६ वर्ष की हुई, तब उन्होंने कच्छ जाने का निश्चय किया । उनकी आत्मा तो परब्रह्म अक्षरातीत से मिलने के लिए व्याकुल हो रही थी । कच्छ में ही साधु-सन्यासियों से ज्ञान व मार्गदर्शन मिलने की सम्भावना थी ।

कुछ समय के पश्चात् उमरकोट से कच्छ के लिए बारात जाने वाली थी । रेतीले रेगिस्तान के एकमात्र मार्ग से ४० कोस की दूरी तय करनी थी । श्री देवचन्द्र जी ने बारात के पीछे-पीछे पैदल चलकर जाने की योजना बनाई परन्तु उन्हें घर से निकलने में देर हो गई । बारात तो सवारियों पर दूर निकल गई और देवचन्द्र जी रात्रि के अन्धकार में रेगिस्तान में अकेले रह गये । किशोर अवस्था व मार्ग न मिलने के कारण मन भयभीत होने लगा ।

इसी समय परब्रह्म अक्षरातीत ने पठान (मुहम्मद मुस्तफा) के भेष में दर्शन दिया । सर्वप्रथम उन्होंने देवचन्द्र जी के पेट का दर्द समाप्त किया । फिर उनका सामान अपने कंधे पर उठाकर कुछ ही क्षणों में उन्हें बारात तक पहुंचा दिया और तत्पश्चात् अन्तर्धान हो गये । धाम धनी के अन्तर्धान होने के पश्चात् देवचन्द्र जी को समझ आया कि स्वयं प्रियतम अक्षरातीत उनकी सहायता करने आये थे ।

कच्छ में अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए श्री देवचन्द्र जी अनेक ज्ञानियों, सन्यासियों, वैरागियों, आदि के पास गए । सर्वप्रथम उन्हें सन्यासियों से अष्टांग योग की शिक्षा मिली । उनके बताये हुए मार्ग के अनुसार उन्होंने दीर्घ काल तक ध्यान-साधना भी की, किन्तु पूर्णब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ ।

इसके पश्चात् वे नाथ पन्थ के अनुयायी योगियों के पास गये । ये लोग राजगुरु कहलाते थे तथा हठयोग की क्रियाओं से इन्होंने अनेक सिद्धियां प्राप्त कर ली थीं । परन्तु श्री देवचन्द्र जी तो मात्र अपने प्रियतम परब्रह्म का साक्षात्कार करना चाहते थे । इसी उद्देश्य से उन्होंने हठयोग की सारी प्रक्रियायें सीखी ।

हठयोग व राजयोग की क्रियाओं से उन्हें करोड़ों सूर्यों के समान तेजोमयी ज्योति का दर्शन हुआ । इसके अतिरिक्त शून्य समाधि में उन्हें शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध से रहित निरुपाधिक आनन्द का भी अनुभव हुआ । परन्तु उनकी आत्मा तो अब भी सच्चिदानन्द के दर्शन के लिए तरस रही थी । नाथ गुरु शून्य समाधि से आगे का मार्ग नहीं बता सके । 

कठोर योग साधना करने के पश्चात् श्री देवचन्द्र जी कापड़ी वैरागियों के पास गये । ये लोग देवी की भक्ति करते थे । पन्द्रह दिन तक इनकी संगति करने के पश्चात् जब कोई सार तत्व नहीं मिला, तो वे मुल्ला जी के पास गये ।

अल्लाह तआला के दीदार के लिए मुल्ला जी ने पांच चीजों पर बल दिया- १) कलमा २) नमाज़ ३) रोज़ा ४) हज ५) जकात । उनकी मान्यता के अनुसार इन पांचों का पालन किये बिना ख़ुदा की प्राप्ति सम्भव नहीं है । इसके अतिरिक्त मुल्ला जी ने अपनी विरोधाभासी मान्यता बताई कि ख़ुदा का स्वरूप बेसबी (निराकार, निर्गुण) है तथा मुहम्मद साहब ने उनसे वार्ता की । श्री देवचन्द्र जी को शरीयत के मार्ग से सन्तोष नहीं हुआ तथा विरोधाभासी सिद्धान्तों के चलते उन्होंने आगे की राह पकड़ी ।

इस प्रकार कच्छ में अनेकों धर्मों व पंथों में भटकने के पश्चात् भी जब श्री देवचन्द्र जी की आत्मा को संतोष नहीं हुआ, तो वे खोज करते हुए भोजनगर पहुँच गये ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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