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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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सागर

सागर ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७४४ में श्री पन्ना धाम में हुआ । यह ग्रन्थ अक्षरातीत के हृदय एवं स्वरूप के आठों सागरों पर विशेष रूप से प्रकाश डालता है ।

अक्षरातीत का हृदय दिव्यताओं का सागर है । श्री राज जी के हृदय में प्रेम, सौन्दर्य, ज्ञान, तेज, एकत्व, कृपा आदि के अनन्त सागर लहरा रहे हैं, जिनका प्रकट रूप परमधाम के पच्चीस पक्ष, आनन्द अंग श्री श्यामा जी, सखियाँ (आतमाएँ), अक्षर ब्रह्म, आदि हैं ।

यहाँ 'सागर' शब्द का प्रयोग अनन्त में भाव में किया गया है । जिस प्रकार मानवीय बुद्धि के लिए मात्रा की दृष्टि से सागर का जल अनन्त (अथाह) होता है, उसी प्रकार अक्षरातीत श्री राज जी के दिल के सागरों को सीमाबद्ध करना असम्भव है । फिर भी इस ग्रन्थ में महामति जी ने, श्री प्राणनाथ जी की कृपा से, उन सागरों को शब्दों में लाने का प्रयास किया है ।

प्रथम, अक्षरातीत के नूर (तेज) का सागर है; द्वितीय, सखियों की अलौकिक शोभा का; तृतीय, सखियों की वाहेदत (एकदिली) का; चतुर्थ, युगल स्वरूप श्री राजश्यामा जी की शोभा-श्रृंगार का सागर है। पंचम, इश्क (प्रेम) का; षष्ठम, अनन्त ज्ञान का; सप्तम, मूल निसबत (सम्बन्ध) का और अष्टम, मेहर (कृपा) का सागर है ।

परमधाम की आत्माओँ का इस नश्वर जगत में पदार्पण होने पर अक्षरातीत ने उनके लिए यह अलौकिक दिव्य ज्ञान अवतरित किया, जिससे आत्माओँ ने उन गोपनीय गुह्य भेदों को जान लिया, जिन्हें वे परमधाम में भी नहीं जानती थीं । जिस प्रकार नमक का ढेला सागर की गहराई नहीं नाप सकता, उसी प्रकार अक्षरातीत के प्रेम की स्वरूप उनकी आत्माएँ युगल स्वरूप के आठों सागर में इस प्रकार खो जाती हैं कि उन्हें अपनी जरा भी सुध नहीं रहती ।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री सागर के सरल भाष्य को पढ़ें)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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