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  सुन्दरसाथ  »  श्री प्राणनाथ जी की पहचान

श्री प्राणनाथ जी की पहचान

श्री प्राणनाथ जी किसी पंचभौतिक तन का नाम नहीं है । मूल मिलावे में विराजमान अक्षरातीत श्री राज जी को अथवा संसार में लीला कर रही उनकी आवेश शक्ति को ही 'प्राणनाथ' कहते हैं ।

सुन्दरबाई कहे अछरातीत से , खेल में आया साथ ।

दोए सुपन ए तीसरा , देखाया प्राणनाथ ।। (श्री मुख वाणी- कि. ९४/९)

श्री श्यामा जी कहती हैं कि अक्षरातीत (परमधाम) से सुन्दरसाथ (ब्रह्मसृष्टि) खेल में आया हुआ है । धाम धनी श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) हमें ब्रज और रास का सपने का खेल, तत्पश्चात् जागनी का यह तीसरा खेल दिखा रहे हैं । तारतम ज्ञान के अवतरण के कारण इस ब्रह्माण्ड को जागनी का ब्रह्माण्ड कहा गया है ।

यहां यह बात स्पष्ट हो जाती है कि परमधाम में विराजमान मूल स्वरूप श्री राज जी तथा श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप में कुछ भी अन्तर नहीं है । यह दोनों सम्बोध�� एक अक्षरातीत स्वरूप के लिए ही हैं ।

श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) ने परमधाम से क्षर ब्रह्माण्ड में आकर पाँच स्वरूप (ब्रज में श्री कृष्ण, रास में श्री कृष्ण, अरब में मुहम्मद साहब, श्री देवचन्द्र और श्री मिहिरराज ) धारण किये, किन्तु इनमें ब्रज में अक्षर ब्रह्म की आत्मा को अपने निज स्वरूप का बोध नहीं था । रास में भी जोश खींचे जाने से पूर्व यही स्थिति थी । अरब में भी मेअराज से पूर्व अक्षर ब्रह्म को कुछ भी पता नहीं था । श्री देवचन्द्र के तन में श्यामा जी की आत्मा पूर्ण रूप से जागृत नहीं हो सकी थी ।

कुंजी भेजी हाथ रूहअल्ला , पर खोल न सके ए ।

फुरमान खुले आखिर , हाथ सूरत हकी जे ।। (श्री मुख वाणी- खि. १४/७०)

अक्षरातीत अल्लाह तआला ने रूह अल्लाह (श्री श्यामा जी) के हाथ तारतम ज्ञान रूपी कुंजी (चाबी) भेजी, परन्तु वे कुरआन के छिपे हुए भेदों को नहीं खोल सके । कुरआन के गुह्य रहस्य तो आखिर (कियामत) के समय में हकी सूरत इमाम महदी विजयाभिनन्द बुद्ध श्री प्राणनाथ जी के द्वारा ही खुले ।

अतः श्री श्यामा जी की वास्तविक जागनी सम्वत् १७३५ के पश्चात् ही दूसरे जामे (श्री मिहिरराज) में हुई । यदि बशरी सूरत (श्री मुहम्मद साहब) दूज का चांद हैं और मल्की सूरत (श्री देवचन्द्र जी) पूर्णमासी की चांद, तो श्री प्राणनाथ जी का हकी स्वरूप दोपहर का सूर्य है ।

ब्रज, रास व अरब में अक्षर ब्रह्म की आत्मा की लीला है । श्री देवचन्द्र व श्री मिहिरराज के तनों में श्री श्यामा जी की लीला है, जिसमें दूसरे तन में श्री इन्द्रावती की आत्मा भी लीला करती है और उन्हें अक्षरातीत की शोभा मिलती है ।

पोते प्रकट पधारया छो , आडा देओ छो वृज  ने रास ।

इंद्रावती सूं अंतर कां कीधूं , तमे देओ मूने तेनो जवाब ।। (श्री मुख वाणी- खटरुती ८/९)

श्री इन्द्रावती जी श्री राज जी को उलाहना देती हुई कहती हैं कि जब आप साक्षात् अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी मेरे हृदय में आ गये हैं तो फिर हमें ब्रज एवं रास की लीला में भ्रमित करने का प्रयास क्यों कर रहे हैं ? निज बुद्धि के तारतम ज्ञान से मुझे यह पता चल गया है कि अखण्ड ब्रज व रास में अब जो स्वरूप (श्री कृष्ण) लीला कर रहा है वह आपसे भिन्न है । आप किस प्रकार मेरी आत्मा से भेद कर सकते हैं । श्री इन्द्रावती जी को इस बात का पश्चाताप हो रहा है कि साक्षात् राजजी के समक्ष रहते हुए भी वे अज्ञानतावश ब्रज, रास के श्री कृष्ण रूप में उलझी रहीं ।

श्री धनी जी को जोस आतम दुलहिन , नूर हुकम बुध मूल वतन ।

ए पांचों मिल भई महामत , वेद कतेबों पहुंची सरत ।। (श्री मुख वाणी- प्र. हि. ३७/१०१)

वेद कतेबों में जिस शुभ घड़ी का वर्णन है, वह समय आ चुका है । श्री महामति जी के तन में सर्वश्रेष्ठ पाँचों शक्तियाँ विराजमान हो गई हैं- अक्षरातीत पूर्णब्रह्म श्री राज जी (श्री प्राणनाथ जी) का आवेश, श्री श्यामा जी की आत्मा, श्री अक्षर ब्रह्म की आत्मा, जोश का फरिश्ता ज़बराइल तथा जागृत बुद्धि का फरिश्ता अस्राफ़िल ।

जो केवल अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी द्वारा धारण किये गये शरीर को ही देखेगा, वह इस नासूत (नश्वर जगत) में ही फँसा रहेगा । परन्तु जिसने उनके लौकिक तन को न देखकर आत्मिक स्वरूप की पहचान कर ली, वह लाहूत (दिव्य परमधाम) पहुँच जाएगा ।

प्रगटे पूरण ब्रह्म सकल में , ब्रह्म सृष्ट सिरदार ।

ईश्वरी सृष्ट और जीव की , सब आए करो दीदार ।। (श्री मुख वाणी- कि. ५७/२)

अब सबके बीच में पूर्णब्रह्म सच्चिदानन्द श्री प्राणनाथ जी प्रकट हो गये हैं । ये ब्रह्मसृष्टियों के प्रियतम हैं तथा ईश्वरी सृष्टि व जीव सृष्टि के परमात्मा हैं । हे संसार के लोगों ! आप सभी आकर इनका दर्शन करो । उन्हीं श्री प्राणनाथ जी के कलियुग में प्रकटन के विषय में सभी धर्मग्रन्थों में विजयाभिनन्द बुद्ध, इमाम महदी, आखिरी मूसा, ईसा, आदि नामों से भविष्यवाणी की गई थी ।

श्री प्राणनाथ जी का स्वरूप ज्ञान की दोपहरी का वह सूरज है, जिसके उग जाने पर अध्यात्म जगत में किसी भी प्रकार का अन्धकार रूपी संशय नहीं रहता । वेदों की ऋचायें जिस अक्षर अक्षरातीत को खोजती हैं, दर्शन ग्रन्थ जिस सत्य को पाना चाहते हैं, गीता और भागवत जिस परम लक्ष्य उत्तम पुरुष की ओर संकेत करती हैं, क़ुरआन की आयतें जिस अल्लाह तआला का वर्णन करना चाहती हैं, बाइबिल जिस प्रेम के स्वरूप का वर्णन करने का प्रयास करती है और सन्तों की वाणियां जिस सत्य की ओर संकेत करती हैं, उसकी पूर्ण प्राप्ति श्री प्राणनाथ जी की वाणी में निहित है ।

कोई दूजा मरद न कहावहीं , एक मेंहेंदी पाक पूरन ।

खेलसी रास मिल जागनी , छत्तीस हजार सैयन ।। (श्री मुख वाणी- सनंध ४२/१६)

पूर्णब्रह्म परमात्मा कहलाने की शोभा किसी अन्य को नहीं, एकमात्र इमाम महदी सच्चिदानन्द श्री प्राणनाथ जी को ही प्राप्त है । वही स्वरूप छत्तीस हजार आत्माओं (बारह हजार ब्रह्मसृष्टियां और चौबीस हजार ईश्वरी सृष्टियां) के साथ जागनी की लीला करेंगे । श्री प्राणनाथ जी ने ही इस नश्वर संसार में परमधाम का अलौकिक ब्रह्मज्ञान प्रकट किया है तथा उसी के माध्यम से वे सभी आत्माओं के ज्ञान चक्षु खोल रहे हैं । जो आत्मा जाग्रत हो जाती है, वह शरीर त्यागने के पश्चात् श्री प्राणनाथ जी के चरणों में श्री गुम्मट जी में लीन हो जाती है ।

ए बानी चित्त दे सुनियो साथ , कृपा करके कहें प्राणनाथ ।

ए किव कर जिन जानो मन , श्री धनी जी ल्याए धाम थें वचन ।। (श्री मुख वाणी- प्र.हि. ३७/१०)

श्री महामति जी कह रही हैं कि हे सुन्दरसाथ जी ! इस तारतम वाणी के वचनों को ध्यान से सुनना तथा अपने हृदय में ग्रहण करना । यह वाणी श्री इन्द्रावती जी की रचना नहीं है । इस वाणी के वचन तो धाम धनी श्री प्राणनाथ जी परमधाम से लेकर आये हैं । यह परमधाम की दिव्य वाणी हमें उनकी कृपा से ही प्राप्त हुई है ।

साथ समस्त के बीच में , जुगल धनी बैठाए ।

कही तुम साक्षात अक्षरातीत हो , हम चीन्हा तुमें बनाए ।। (श्री बीतक साहब ६०/५७)

श्री ठकुरानी जी साथ संग ले , पधारे मेरे घर ।

धनी बिना तुम्हें और देखे , सो नहीं मिसल मातबर ।। (श्री बीतक साहब ६०/५८)

श्री राज रूमाल लेए के , सिर पर धरा महाराज ।

हाथ धरा सिर ऊपर , होए पूरन मनोरथ काज ।। (श्री बीतक साहब ६०/३१)

एही अक्षरातीत हैं , एही हैं धनी धाम ।

एही महंमद मेंहदी ईसा , एही पूरे मनोरथ काम ।। (श्री बीतक साहब- ६६/७१)

विजियाभिनन्द बुध जी , ब्रह्म सृष्ट सिरताज ।

हाथ हुकम छत्रसाल के , दियो सो अपनो राज ।। (श्री बीतक साहब ५८/५९)

ऊपर लिखी गयीं श्री बीतक की चौपाइयों में स्पष्ट वर्णन है कि श्री प्राणनाथ जी साक्षात् श्री राज जी के स्वरूप हैं । उन्हें ही अक्षरातीत, धाम धनी, श्री राज, इमाम मुहम्मद महदी, विजियाभिनन्द बुद्ध, आदि नामों से वर्णित किया गया है । श्री राज जी ने इन्द्रावती जी को अपने इस स्वरूप की सारी शोभा दे दी है ।

बीतक में सर्वत्र ही श्री महामति जी के धाम हृदय में विराजमान अक्षरातीत को श्री राज, वालाजी, प्राणनाथ, आदि सम्बोधनों से वर्णित किया गया है । इससे यह स्पष्ट है कि परमधाम में श्री राजजी ही हैं । ब्रज-रास के नाम को हठपूर्वक परमधाम में थोपना तथा श्री प्राणनाथ जी को संत या आचार्य समझना ब्रह्मवाणी के कथनों के सर्वथा विपरीत है । बीतक साहब में श्री प्राणनाथ जी को चार बार 'अक्ष��ातीत' , बाइस बार 'हक' और दो सौ छब्बीस बार 'राज' कहा गया है । यह शोभा मात्र उन्हीं के लिए है ।

बोझ अपनों निज वतन को , सो सब मेरे सिर दियो ।

नाम सिनगार सोभा सारी , मैं भेख तुमारो लियो ।। (श्री मुख वाणी- कि. ६२/१५)

श्री महामति जी कहती हैं- हे धनी ! परमधाम की सभी ब्रह्मसृष्टियों की जागनी का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व आपने मुझे सौंप दिया है । आपने अपना नाम, श्रृंगार तथा अपनी सारी शोभा मुझे ही सौंप दी है । इस प्रकार मै इस संसार में अक्षरातीत परमात्मा के स्वरूप में जाहिर हो गई हूँ ।

छठे दिन की लीला में श्री राज जी ने हुक्म अपने हाथ में ले लिया है तथा अब ब्रह्मवाणी के द्वारा जागनी का कार्य हो रहा है । इसका यह आशय कदापि नहीं है कि अब जागनी लीला में श्री महामति जी की कोई भूमिका नहीं है । वस्तुतः इस जागनी ब्रह्माण्ड में पांचवे दिन से लेकर योगमाया में अखण्ड होने (सातवें दिन) तक अक्षरातीत की सारी शोभा श्री महामति जी को ही प्राप्त है । यद्यपि इस छठे दिन की लीला में भिन्न-भिन्न आत्माओं के द्वारा जागनी की लीला चलती रहती है और इसमें प्रत्यक्ष रूप से श्री महामति जी की लीला नहीं दिखाई देती, फिर भी इन सभी लीलाओं के मूल में वे स्वयं ही हैं । उनके ही चरणों में प्रत्येक ब्रह्मात्मा को अध्यात्म का सम्पूर्ण धन (ज्ञान, शक्ति और जागनी की प्रेरणा) प्राप्त होता है तथा देह त्याग के पश्चात् भी उन्हीं के चरणों गुम्मट जी पहुंचना पड़ता है । धाम धनी ने महामति जी को ही सारी शोभा दे रखी है-

इंद्रावती के मै अंगे संगे , इंद्रावती मेरा अंग ।

जो अंग सौंपे इंद्रावती को , ताए प्रेमे खेलाऊं रंग ।। (श्री मुख वाणी- क. हि. २३/६६)

सुख देऊं सुख लेऊं , सुख में जगाऊं साथ ।

इंद्रावती को उपमा , मैं दई मेरे हाथ ।। (श्री मुख वाणी- क. हि. २३/६८)

यदि यह संशय किया जाये कि छठे दिन की लीला में तो धाम धनी श्री राज जी ने सभी के दिल को अपना धाम बनाया है तो हम अपने सदगुरु, किसी परमहंस या स्वयं अपनी आत्मा के हृदय में विराजमान युगल स्वरूप को क्यों न प्रणाम करें ? श्री महामति जी पर अनिवार्य रूप से इतनी श्रृद्धा की क्या आवश्यकता है ? श्री महामति जी को तो हमने देखा नहीं है । ऐसी स्थिति में किसी भी वर्तमान परमहंस को अक्षरातीत मानकर रिझाने में क्या आपत्ति है ? इसका समाधान इस प्रकार है-

ब्रह्मवाणी के द्वारा यह स्पष्ट रूप से निर्देश दिया जा चुका है कि इस जागनी ब्रह्माण्ड में श्री प्राणनाथ जी के अतिरिक्त अन्य किसी को भी अक्षरातीत कहलाने की शोभा नहीं है । "कोई दूजा मरद न कहावहीं , एक मेंहेंदी पाक पूरन " सनंध ४२/१६ के इस कथन से इसकी पुष्टि होती है । महाराजा छत्रसाल जी के धाम हृदय में विराजमान होकर धाम धनी ने सात वर्षों तक आवेश लीला की । उन्हें 'अमीरूल मोमिनीन' की भी शोभा मिली, फिर भी उन्हें अक्षरातीत नहीं कहा गया । इसी प्रकार श्री लालदास जी के धाम हृदय में विराजमान होकर उन्होंने बीतक की रचना करवाई, फिर भी उन्हें अक्षरातीत की शोभा नहीं मिली । जब महान शोभा वाली इन आत्माओं की यह स्थिति है तो अन्यों को अक्षरातीत की शोभा कैसे दी जा सकती है ? किसी भी ब्रह्ममुनि, परमहंस या सदगुरु के धाम हृदय में विराजमान अक्षरातीत को अवश्य प्रणाम करना चाहिए और उनके प्रति श्रृद्धा और समर्पण की भावना भी रखनी चाहिए, किन्तु उन्हें श्री प्राणनाथ जी के बराबर शोभा वाला नहीं माना जा सकता क्योंकि इससे श्री मुख वाणी और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन होगा और आध्यात्मिक समाज अनेक व्यक्तियों के नाम पर अलग-अलग गुटों में बँट जायेगा, जिसका परिणाम बहुत ही भयावह होगा । यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि हम जिन परमहंसों या सदगुरु पर निष्ठा रखते हैं, उन्होंने भी अध्यात्म की इस उच्च अवस्था की प्राप्ति श्री प्राणनाथ जी की कृपा से ही की होती है । यद्यपि परमधाम की वहदत से सभी आत्माएँ समान हैं और अक्षरातीत श्री राज जी का ही स्वरूप हैं, किन्तु इस संसार में एक से अधिक स्वरूप को अक्षरातीत के रूप में मानना कदापि उचित नहीं है ।

महाप्रलय के पश्चात् भी बेहद मण्डल में ब्रह्माण्ड के सभी प्राणियों को जागृत ज्ञान का जो प्रकाश मिलेगा, उसमें भी श्री महामति जी का ही निर्देशन रहेगा, क्योंकि उन्हीं के धाम हृदय में इस्राफिल फरिश्ता (जागृत बुद्ध) विद्यमान होगा । इस प्रकार ही श्री महामति जी के द्वारा सारे ब्रह्माण्ड को ज्ञान व मुक्ति प्राप्त होगी ।

इतहीं सिजदा बंदगी , इतहीं जारत जगात ।

इतहीं जिकर हक दोस्ती , इतहीं रोजा खोलात ।।  (श्री मुख वाणी- सि. २/४६)

अब श्री महामति जी के धाम हृदय में विराजमान धाम धनी श्री प्राणनाथ जी के चरणों में प्रणाम करना है और अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति से इन्हें रिझाना है । इन्हीं के दर्शन करने के लिए तीर्थ यात्रा (जियारत) भी करनी है और इन्हीं पर अपना सर्वस्व समर्पण (जकात) करना है । इन्हीं के चरणों में बैठकर धनी के प्रेम की वार्ता रूपी चर्चा (जिकर) का श्रवण करना है । इन्हीं श्री प्राणनाथ जी के पावन सान्निध्य में श्रृद्धा और सेवा के द्वारा स्वयं को पवित्र करना (रोजे रखना) है ।

रात दिन बसें हक अर्स में , मेरा दिल किया अर्स सोए ।

क्यों न होए मोहे बुजरकियां , ऐसा हुआ न कोई होए ।। (श्री मुख वाणी- सि. १/३)

श्री महामति जी कहती हैं कि परमधाम में अक्षरातीत अखण्ड रूप से विराजमान रहते हैं, किन्तु अब तो उन्होंने मेरे दिल को ही अपना धाम बना लिया है । ऐसी स्थिति में इस संसार में मेरी शोभा क्यों नहीं होगी ?

श्री महामति जी को ही यह शोभा प्राप्त है कि उनके हृदय में २४ घण्टे श्री प्राणनाथ जी का आवेश विराजमान है । न केवल पाँचवे दिन की लीला में, अपितु छठे मोमिनों के दिन व सातवें कज़ा के दिन की लीला में भी यह शोभा उसी स्वरूप को प्राप्त है । यदा-कदा किसी परमहंस द्वारा जागनी कार्य हेतु कुछ क्षणों के लिए उनके तन में आवेश लीला हो सकती है, परन्तु पूरे जीवन काल के लिए यह सम्भव नहीं है ।

श्री प्राणनाथ जी के समान शोभा वाला स्वरूप न तो पहले किसी ब्रह्माण्ड में आया था और न ही भविष्य में पुनः कभी किसी भी ब्रह्माण्ड में आयेगा । वे तो ब्रह्मसृष्टियों के प्रियतम हैं, जो उन्हें माया का खेल दिखाने लाये हैं । इस संसार के लोग बहुत भाग्यशाली हैं कि संयोगवश उन्हें पूर्णब्रह्म श्री प्राणनाथ जी के दर्शन व साहचर्य का अवसर मिला है । श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की महिमा सर्वोपरि है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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