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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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रास

रास ग्रन्थ में अक्षरातीत श्री राज जी के द्वारा श्री कृष्ण का तन धारण करके अपनी आत्माओं के साथ की गयी पवित्र प्रेम लीला का वर्णन है । परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी की रसमयी ब्रह्मलीला ही रास है ।

यद्यपि श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में पाँच अध्यायों में रास का वर्णन तो है, किन्तु वह अस्पष्ट रूप से है । उसमें योगमाया की शक्ति के द्वारा इस नश्वर ब्रह्माण्ड में खेली गई प्रतिबिम्ब की रासलीला का वर्णन है । वास्तविक महारास तो उससे पूर्व ही केवल ब्रह्म (योगमाया) के अखण्ड व आनन्दमय ब्रह्माण्ड (नित्य वृंदाव��) में खेली गई है ।

रास ग्रन्थ में उसी अखण्ड महारास का वर्णन है, जो बिना बाधा आज भी उसी प्रकार चल रही है । इस ग्रन्थ में धाम धनी अक्षरातीत के युगल स्वरूप व आत्माओं के श्रृंगार का वर्णन है । नित्य उनके द्वारा खेली जा रही सभी रामतों का भी विस्तृत वर्णन है ।

ऐसा प्रत्यक्ष वर्णन संसार के किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं हो सकता, क्योंकि जिन प्राणनाथ जी ने श्री कृष्ण के तन में बैठकर ब्रज व रास की लीला खेली, उन्होंने स्वयं कलयुग में श्री मिहिरराज के तन में बैठकर 'श्री कुलजम स्वरूप' वाणी के माध्यम से उसका वर्णन किया है ।

इस ग्रन्थ से इन प्रश्नों का समाधान होता है कि नित्य वृंदावन कहाँ है और वहाँ लीला करने वाले श्री कृष्ण का स्वरूप, श्रृंगार और लीला क्या है ? इसी प्रकार इंजील (कतेब पक्ष में 'रास' का ही दूसरा नाम) ग्रन्थ के "God is Love and Love is God" तथा गीता के "अनन्य प्रेम लक्षणा" सिद्धान्त का भी क्रियात्मक रूप में वर्णन है ।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ, सरसावा द्वारा प्रकाशित रास टीका पढ़ें।)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा