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धर्मग्रन्थों की भविष्यवाणियाँ

बुद्ध गीता

वाराह कल्प के अट्ठाइसवें कलियुग के प्रारम्भ में ही श्री बुद्ध जी का यह स्वरूप प्रकट होगा । तब सर्वत्र ही अपने और पराये का यह भेद नहीं हो सकता है ।।१२।।

वह बुद्ध जी ही अपने दूसरे तन के स्वरूप में 'कल्कि' नाम से ���हलायेंगे (बुद्ध जी का पहला तन श्री देवचन्द्र जी तथा दूसरा तन श्री मिहिरराज जी) । वह ही आदि नारायण को भी अखण्ड धाम का सर्वोच्च ज्ञान देने वाले होंगे ।।२३।।

संसार के सभी धर्मग्रन्थ रूपी लाखों जिह्वायें होते हुए भी (मर्मज्ञ होते हुए भी) सबके आश्रय स्वरूप वह बुद्ध जी तुतली (बोलचाल की सामान्य) भाषा में अपना ज्ञान (श्री कुलजम स्वरूप) देने वाले होंगे ।।२८।।

जब यवनों (मुसलमानों) के द्वारा मन्दिरों को गिराया जाने लगेगा तथा तीर्थों की महिमा भी कम होती जायेगी, तब श्री बुद्ध जी का प्रकटन होगा ।।३४।।

बुद्ध स्तोत्र

कलियुग के प्रथम चरण में वह सच्चिदानन्द परब्रह्म अचानक ही ज्ञान रूप से प्रकट होंगे, जिनके ज्ञान को प्राप्त करके तुम स्वयं भी ज्ञानमयी हो जाना ।।५।।

पुराण संहिता

अज्ञानता के अगाध सागर में प्रियाओं के गिर जाने पर प्रियतम परब्रह्म स्वयं अपने कृपा रूपी महासागर में स्नान करायेंगे अर्थात् स्वयं प्रकट होकर अपने अलौकिक ज्ञान से उन्हें जाग्रत करेंगे । (३१/५०)

भावार्थ- ब्रह्मसृष्टियों के संसार में प्रकटन का वर्णन पहले ही किया जा चुका है । इस श्लोक से अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी का प्रकटन सुनिश्चित होता है ।

परमधाम की आत्मायें सुन्दरी और इन्दिरा (श्यामा जी और इन्द्रावती जी) जिन दो तनों में प्रकट होंगी, उनके नाम चन्द्र और सूर्य (देवचन्द्र और मिहिरराज) होंगे । तथा इनके अन्दर साक्षात् परब्रह्म विराजमान होकर लीला करेंगे, जिससे माया के अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश हो जाएगा । (३१/५२-७० का सारांश)

इस प्रकार अपने प्रियतम के द्वारा जाग्रत की हुई सभी सखियों में से कोई सुन्दरी नामक भाग्यशालिनी सखी सबको जाग्रत करेगी । (३३/१५५)

वह सुन्दरबाई इन्दिरा की सहायता प्राप्त करके जागनी करेगी । सुन्दरी के मन में साक्षात् स्वामिनीजी की ही सुरता प्रवेश करेगी । इस प्रकार इस जागनी के मार्ग में सुन्दरी को ही सदगुरु माना गया है । (३४/४३,४९)

बृहद्सदाशिव संहिता

परब्रह्म की आनन्द स्वरूपा जो सखियां ब्रज और वृंदावन में स्थित थीं, वे कलियुग में पुनः प्रकट होंगी और जाग्रत होकर पुनः अपने उस धाम में जायेंगी । (श्रुति रहस्य १७)

चिदघन स्वरूप परब्रह्म के आवेश से युक्त अक्षर ब्रह्म की बुद्धि अक्षरातीत की प्रियाओं को जाग्रत करने के लिए तथा सम्पूर्ण लोकों को मुक्ति देने के लिए भारतवर्ष में प्रकट होगी । वह प्रियतम के द्वारा स्वामिनी (श्री श्यामा जी) के हृदय में स्थापित किए जाने पर चारों ओर फैलेगी । (श्रुति रहस्य १८,१९)

भावार्थ- श्री श्यामा जी (श्री देवचन्द्र जी) को साक्षात्कार के साथ ही अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के द्वारा जागृत बुद्धि का तारतम ज्ञान प्राप्त हुआ । तत्पश्चात् श्री श्यामा जी व अक्षरातीत परब्रह्म का आवेश इन्द्रावती जी के हृदय में विराजमान हो गया तथा उनके द्वारा ब्रह्मवाणी का प्रकटन व जागनी करके उन्हें 'श्री प्राणनाथ जी' की शोभा प्राप्त हुई । इस प्रकार दोनों ही तनों से श्री श्यामा जी ने ही लीला की ।

श्रीमद्भागवत्

शान्तनु के भाई देवापि तथा इक्ष्वाकु वंशीय राजा मरु इस समय कलाप ग्राम में स्थित हैं । वे दोनो महान योगबल से युक्त हैं । परमात्मा की प्रेरणा से वे दोनो कलियुग में पहले की ही भांति धर्म की स्थापना करेंगे । (१२/२/३७,३८)

भावार्थ- उपरोक्त तीनों ग्रन्थ एक दिशा में ही संकेत कर रहे हैं । परमयोगी देवापि के जीव ने श्री देवचन्द्र (चन्द्र) के रूप में जन्म लिया । उनके अन्दर परमधाम की श्री श्यामा जी (सुन्दरी) की आत्मा ने प्रवेश किया । अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के साक्षात्कार के पश्चात् उन्होंने आत्माओं की जागृति के लिए निजानन्द सम्प्रदाय का संस्थापन किया ।

परमयोगी राजा मरु के जीव ने श्री मिहिरराज (सूर्य) के रूप में जन्म लिया । उनके अन्दर परमधाम की श्री इन्द्रावती जी (इन्दिरा) की आत्मा ने प्रवेश किया । सम्वत् १७३५ में हरिद्वार में सर्वसम्मति से हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों के आचार्यों ने उन्हें 'विजयाभिनन्द निष्कलंक बुद्ध' माना । इस प्रकार परब्रह्म अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने अपना नाम व सारी शोभा श्री इन्द्रावती जी को दे दी ।

भविष्योत्तर पुराण

ब्रह्मा जी ने कहा- हे नारद ! भयंकर कलियुग के आने पर मनुष्य का आचरण दुष्ट हो जाएगा और योगी भी दुष्ट चित्त वाले होंगे । संसार में परस्पर विरोध फैल जायेगा । द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) दुष्ट कर्म करने वाले होंगे और विशेषकर राजाओं में चरित्रहीनता आ जायेगी । देश-देश और गांव-गांव में कष्ट बढ़ जायेंगे । साधू लोग दुःखी होंगे । अपने धर्म को छोड़कर लोग दूसरे धर्म का आश्रय लेंगे । देवताओं का देवत्व भी नष्ट हो जायेगा और उनका आशीर्वाद भी नहीं रहेगा । मनुष्यों की बुद्धि धर्म से विपरीत हो जायेगी और पृथ्वी पर म्लेच्छों के राज्य का विस्तार हो जायेगा ।

जब हिन्दू तथा मुसलमानों में परस्पर विरोध होगा और औरंगज़ेब का राज्य होगा, तब विक्रम सम्वत् १७३८ का समय होगा । उस समय अक्षर ब्रह्म से भी परे सच्चिदानन्द परब्रह्म की शक्ति भारतवर्ष में इन्द्रावती आत्मा के अन्दर विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक स्वरूप में प्रकट होगी । वह चित्रकूट के रमणीय वन के क्षेत्र (पद्मावतीपुरी पन्ना) में प्रकट होंगे । वे वर्णाश्रम धर्म (निजानन्द) की रक्षा तथा मंदिरों की स्थापना कर संसार को प्रसन्न करेंगे । वे सबकी आत्मा, विश्व ज्योति पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं । म्लेच्छों का नाश करने वाले बुद्ध ही होंगे और श्री विजयाभिनन्द नाम से संसार में प्रसिद्ध होंगे । (उ.ख.अ. ७२ ब्रह्म प्र.)

वह परब्रह्म पुरुष निष्कलंक दिव्य घोड़े पर (श्री इन्द्रावती जी की आत्मा पर) बैठकर, निज बुद्धि की ज्ञान रूपी तलवार से इश्क बन्दगी रूपी कवच और सत्य रूपी ढाल से युक्त होकर, अज्ञान रूपी म्लेच्छों के अहंकार को मारकर सबको जागृत बुद्धि का ज्ञान देकर अखण्ड करेंगे । (प्र. ३ ब. २६ श्लोक १)

माहेश्वरतन्त्रम्

द्वापर के अन्त होने पर कलियुग में लीला के आविर्भाव होने से, परब्रह्म अपनी प्रियाओं की दुखपूर्ण लीला को न सहते हुए, उनमें से एक परम सौभाग्यशालिनी सुन्दरी नाम की प्रिया को निर्णय बतलाकर प्रबोधित करेंगे । (२२/२७,२८)

सिख पंथ के 'पुरातन सौ साखी' (भविष्य की साखियां) ग्रन्थ का पृष्ठ ६५-६६

नेह कलंक होय उतरसी , महाबली अवतार । संत रक्षा जुग जुग करे , दुष्टा करे संहार ।।    नवां धरम चलावसी , जग में होवन हार । नानक कलजुग तारसी , कीर्तन नाम आधार ।।

भविष्य दीपिका ग्रन्थ

शाका शालिवाहन के १६०० वर्ष व्यतीत हो जाने पर (विक्रम सम्वत् १७३८) सम्पूर्ण जीवों के उद्धार के लिए इस ब्रह्माण्ड में 'कल्कि' का आगमन होगा । (अध्याय ३)

सुन्दरी तन्त्र

पद्मावती और केन नदी के मध्य विन्धयाचल पर्वत के एक क्षेत्र में इन्द्रावती नामक परब्रह्म की आत्मा होगी । उनके अन्दर परब्रह्म सच्चिदानन्द विराजमान होकर पूर्ण ब्रह्म कहलायेंगे ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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