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बाइबल की भविष्यवाणी

एक शक्तिशाली शोर तथा सबसे बड़े हुक्म के फ़रिश्ते और (परमात्मा की) महान तुरही से युक्त आत्मा को झकझोरने वाली तेज आवाज़ के साथ परब्रह्म अपने परमधाम से स्वयं आयेंगे और विश्वास करने वाले वे लोग, जो मर चुके हैं, परब्रह्म से मिलने के लिए सबसे पहले उठेंगे । (द सैलोनियन्स ४/१६)

भावार्थ- बाइबल के इस कथन में जाग्रत बुद्धि के फ़रिश्ते इस्राफील को परब्रह्म की तुरही कहा गया है । अर्थात् द लार्ड (श्री प्राणनाथ जी) जब इस दुनिया में आयेंगे जो उनके साथ आत्मा को झकझोरने वाली तेज आवाज अर्थात् निज बुद्धि का ज्ञान (श्री कुलजम स्वरूप), हुक्म की शक्ति तथा इस्राफील फ़रिश्ता होगा । मरे हुए लोगों के दोबारा जीवित होने का यह अर्थ है कि परब्रह्म के दिए हुए जाग्रत ज्ञान को पाकर वे अपनी तथा अक्षरातीत परब्रह्म की वास्तविक पहचान कर लेंगे ।

परब्रह्म के साथ इस्राफील तथा हुक्म की शक्ति होने से यह स्पष्ट होता है कि बाइबल के अनुसार भी परब्रह्म के इस नश्वर जगत में प्रकट होने का वही समय सम्वत् १७३८ या हिज़री १०९० या ईस्वी १६९१ है जो हिन्दू धर्मग्रन्थों तथा क़ुरआन में लिखा है ।

निश्चित रूप से तुममें से कोई भी उस दिन को नहीं जानता क्योंकि परब्रह्म रात्रि में एक चोर की भांति आयेंगे । (द सैलोनियन्स ५/२)

भावार्थ- धर्मग्रन्थों में परब्रह्म के आने का वर्णन संकेतों में होने के कारण सामान्य लोग उनके आने की सही जानकारी नहीं प्राप्त कर पायेंगे । 'चोर' शब्द का प्रयोग करने से अभिप्राय है कि वे इतनी गुह्य रूप से लीला करेंगे कि कोई साधारण जीव उन्हें पहचान भी नहीं पाएगा ।

धैर्य और साहस रखो क्योंकि परब्रह्म का आना निकट है । देखो ! महान न्यायाधीश आ रहा है । (जेम्स ५/८,९)

प्रिय मित्रों ! यह मत भूलिए कि अब से एक हजार वर्ष परब्रह्म के लिए कल (एक दिन) के समान है । (पीटर २/८)

यद्यपि उन्होंने (परमात्मा ने) संसार को बनाया है, लेकिन जब वे आयेंगे संसार उनकी पहचान नहीं करेगा । (जॉन १/१०) 

परमात्मा ने कहा- मेरी भेड़ें (आत्माएँ) मेरी आवाज़ को पहचानेंगी और मै उन्हें जानता हूँ और वे मेरा समर्थन करेंगी । (जॉन १०/२७)

भावार्थ- परब्रह्म की आत्माओं को ही संकेत में भेड़ कहा गया है । परमात्मा (श्री प्राणनाथ जी) की आवाज़ उनके द्वारा अवतरित श्री कुलजम स्वरूप (तारतम) वाणी है । अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी की वास्तविक पहचान उनकी आत्माएँ ही करेंगी ।

परब्रह्म ने कहा- मै स्वयं अपनी भेड़ों (आत्माओं) को, जहाँ कहीं भी वे अज्ञान में बिछुड़ी पड़ी होंगी, ढूँढूगा और मुलाकात करूँगा और उनको लोगों के समूह से बाहर निकालूँगा । उन्हें अलग-अलग देशों से निकालकर एकत्र करूँगा और उनको निजधाम ले जाऊँगा । (३४/१)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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