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चितवनि
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चितवनि की विधि

अपने आसन के आधे भाग पर बैठकर बिना जीभ या होंठ हिलाये तारतम का मौन जप कीजिए । किसी अभ्यस्त आसन (पद्मासन, सुखासन, स्वास्तिकासन, आदि) पर इस तरह से बिना हिले-डुले बैठिये कि आप अपने पंचभौतिक तन को भूल जायें तथा अपना आत्मिक स्वरूप परआतम जैसा (श्री श्यामा जी जैसा) ही मानिये, क्योंकि आत्मा परआतम का प्रतिबिम्ब है ।

तारतम जप के साथ सदगुरु (किसी ब्रह्ममुनि जिससे तारतम लिया हो) या गुम्मट जी की सेवा का ध्यान कीजिए । थोड़ी देर में आभास होगा कि अक्षरातीत श्री राज जी का जोश स्वयं या सदगुरु रूप में आपके आगे आकर विराजमान हो गया है । सदगुरु के उस स्वरूप को प्रणाम करते हुए अपनी आत्मा से परमधाम की तरफ चलिए । गुम्मट जी की सेवा का ध्यान करने वाले को अपने आगे हकी स्वरूप श्री प्राणनाथ जी का भाव लेकर प्रणाम करना चाहिए ।

इसके पश्चात् अष्टावरण युक्त चौदहलोक, सात शून्य को पार करते हुए आदि नारायण को देखते हुए मेरी आत्मा ने मोहसागर (महाशून्य) के घने अन्धकार में प्रवेश किया ।

मोहसागर को पार करते हुए अब मेरी आत्मा सदगुरु महाराज के साथ योगमाया (बेहद, अक्षर ब्रह्म की भूमिका) के चेतन ब्रह्माण्ड में प्रवेश कर रही है, जहाँ कण-कण में करोड़ों सूर्यों की आभा है । अव्याकृत में प्रणव ॐकार सुमंगला पुरुष को देखते हुए मेरी आत्मा सबलिक ब्रह्म में पहुँची, जहाँ चिदानन्द लहरी पुरुष को देखा । इसके आगे अखण्ड ब्रज है, तत्पश्चात् अखण्ड महारास की लीला देखी । इसके पश्चात् सबलिक ब्रह्म का किशोर युगल स्वरूप दृष्टिगोचर हुआ । इसके आगे मेरी आत्मा ने केवल ब्रह्म का किशोर युगल स्वरूप तथा सत्स्वरूप का किशोर युगल स्वरूप देखा । सदगुरु का स्वरूप यहीं अक्षर ब्रह्म के अहंस्वरूप सत्स्वरूप ब्रह्म तक ही जाएगा ।

इसके आगे अक्षरातीत श्री राज जी का प्रेम पाकर मेरी आत्मा ने अखण्ड परमधाम (दिव्य ब्रह्मपुर धाम) में प्रवेश किया । परमधाम की अलौकिक तेजमयी शोभा व सुन्दरता को देखते हुए मेरी आत्मा मूल मिलावा में पहुँची । वहाँ उसने अक्षरातीत युगल स्वरूप श्री राजश्यामा जी को देखा । इस अलौकिक सौन्दर्य को देखकर मेरी आत्मा आनन्द में डूब गयी । मेरी आत्मा ने युगल स्वरूप के अंगों की तेजमयी शोभा, श्रृंगार, वस्त्रों-आभूषणों की शोभा का निहारा । फिर उसने अपनी परआतम को देखा ।

इस प्रकार दीर्घ अवधि तक इस शोभा को देखने के पश्चात् मेरी आत्मा का ध्यान वापस मृत्युलोक पहुँच गया ।  

(विस्तृत विधि सीखने के लिए किसी ब्रह्ममुनि सुन्दरसाथ से तारतम ग्रहण करें तथा श्री राजन स्वामी कृत ग्रन्थ 'चितवनि' और 'निजानन्द योग' अवश्य पढ़ें )  

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा