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श्री निजानन्द सम्प्रदाय के सिद्धान्त

  • परब्रह्म अक्षरातीत को ही अपना इष्ट मानते हैं ।

  • वह अक्षरातीत युगल स्वरूप, परम किशोर, अनादि, अविनाशी व स्वलीला अद्वैत है ।

  • दिव्य ब्रह्मपुर ही हमारा धाम है ।

  • धाम धनी अक्षरातीत की उपासना पतिव्रत साधन से करते हैं ।

  • हकी स्वरूप श्री प्राणनाथ जी की शोभा सुन्दरसाथ (परमहंसों) व हद-बेहद ब्रह्माण्डों में सर्वोपरि है ।

  • अपने पूजा स्थल में श्री प्राणनाथ जी (परब्रह्म अक्षरातीत) द्वारा अवतरित वाणी 'श्री कुलजम स्वरूप' को उन्ही का वाङमय स्वरूप मानकर पूजा करते हैं । सभी पूजा स्थल वास्तव में ज्ञान मंदिर हैं, जिनका मूल प्रयोजन श्री मुख वाणी के पठन-पाठन व चि��्तन-मनन को प्रोत्साहित करना है ।

  • श्री प्राणनाथ जी के वाङमय स्वरूप के अतिरिक्त किसी अन्य स्वरूप, व्यक्ति, मूर्ति, चित्र, समाधि या जड़ वस्तु की पूजा निषेध है ।

  • निजानन्द सम्प्रदाय के सभी अनुयायियों (सुन्दरसाथ) को परमधाम की आत्मा (ब्रह्मसृष्टि) मानकर उनकी सेवा करना ।

  • सभी सुन्दरसाथ समान हैं । उनमें आध्यात्मिक पद, आयु, जाति, क्षेत्र, लिंग या आर्थिक स्थिति का भेद मान्य नहीं है । आत्मिक दृष्टिकोण व आध्यात्मिक योग्यता को ही प्राथमिकता देना ।

  • परमधाम की आत्माएँ जो अभी संसार में ही मग्न हैं, उन तक ब्रह्मवाणी को पहुँचाना ही जागनी है । जागनी सभी सुन्दरसाथ का नैतिक धर्म व वास्तविक सेवा है ।

  • जिस प्रकार दीपक से दीपक जलाया जाता है, उसी प्रकार कोई भी सुन्दरसाथ किसी भी जिज्ञासु व्यक्ति को प्रबोधित करके (तारतम देकर) सुन्दरसाथ के समूह में सम्मिलित कर सकता है ।

  • किसी भी शारीरिक कर्मकाण्ड (जप, परिक्रमा, उपवास, भजन-नृत्य, आदि) पर विश्वास न करके आत्मिक भाव से ज्ञानार्जन, प्रेम व चितवनि के मार्ग पर चलना ।

  • सबसे पूजनीय स्थान श्री ५ पद्मावती पुरी (पन्ना, मध्य प्रदेश) को माना जाता है ।

  • धूम्रपान, मांस, मदिरादि नशीले पदार्थ व तामसी भोजन का सेवन वर्जित है । विषय-वासना, झूठ व चोरी से संयम करना आवश्यक है ।

  • श्री प्राणनाथ जी के आवेश से अवतरित श्री कुलजम स्वरूप वाणी व श्री बीतक साहेब पूज्य ग्रन्थ हैं ।

  • सभी आयु वर्ग के सुन्दरसाथ एक-दूसरे को समान मानते हुए परस्पर अभिवादन में प्रणाम का प्रयोग करते हैं।

  • शारीरिक संस्कारों (जन्म, विवाह, मृत्यु, आदि) को भी सादी रीति से निभाना । कोई विशेष कर्मकाण्ड वर्जित है।

  • जो हमारे साथ बुराई करे उसके साथ भी भलाई करना ।

  • धर्म के अन्य सामान्य सिद्धान्तों का पालन ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा