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चितवनि
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चितवनि से पूर्व तैयारी

आहार

चितवनि की प्रक्रिया में आहार शुद्धि का विशेष महत्व है । 'आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः' का कथन अक्षरशः सत्य है । ध्यान (चितवनि) करने वालों को तामसिक और राजसिक भोजन का त्याग करना अति आवश्यक है । सभी दुर्गन्धित खाद्य पदार्थ (मांस, शराब, बासी भोजन, लहसुन, प्याज) तामसिक होते हैं । इनका सेवन करने वाला ध्यान का अधिकारी नहीं हो सकता । इसी प्रकार कटु, खट्टे, बहुत गर्म, रूखे, चाय, कॉफी तथा तीखी मिर्चों से युक्त पदार्थ राजसिक होते हैं, जो मन को चंचल और उत्तेजक बनाते हैं । ध्यान की उच्च अवस्था में पहुँचने के लिए इनका भी सेवन त्याग देना चाहिए ।

भोजन के सम्बन्ध में एक सूत्र याद रखना चाहिए- "आधा पेट परम योगी, पौन पेट योगी तथा पूरा पेट भोगी" । ब्राह्मी आवस्था को प्राप्त होने वाले ब्रह्ममुनि परमहंस हमेशा आधा पेट ही भोजन करते हैं । पेट भर भोजन करने वाले लोग तामसिक भावों के शिकार बन जाते हैं, परिणामस्वरूप वे प्रेम लक्षणा भक्ति से कोसों दूर रह जाते हैं । चितवनि की राह पर चलने वाले सुन्दरसाथ को दुग्ध, फल, शाक, सब्जी तथा शुद्ध सात्विक अन्न का अल्पमात्रा में सेवन करना चाहिए । जल का भी उचित प्रयोग मन को सात्विक बनाये रखने में सहायता करता है ।

स्थान व समय

चितवनि के लिए किसी स्वच्छ स्थान व पवित्र वातावरण का चयन करें । बन्द कमरे में बैठने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि कहीं से शुद्ध वायु का संचार अवश्य होता ���हे । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखें कि उस स्थान पर जरा भी ध्वनि न आये, अन्यथा चितवनि की गहराई में नहीं पहुँचा जा सकता । इसी कारण चितवनि के लिए रात्रि एक से प्रातः छः बजे का समय उत्तम माना जाता है । वैसे जब भी समय मिले तब कर सकते हैं ।

सामग्री

शरीर को स्थिर करने के लिए एक स्वच्छ और कोमल कम्बल आदि का आसन बनायें । उस पर एक मीटर श्वेत सूती कपड़ा बिछायें । तत्पश्चात् आधे भाग पर स्वयं बैठें तथा आधा भाग सदगुरु या धनी श्री राज के जोश के विराजमान होने के लिए छोड़ दीजिए ।

आसन अभ्यास

चितवनि के प्रारम्भिक चरण में शरीर और मन को स्थिर करना होता है ।

यह योग का सामान्य सिद्धान्त है कि जब शरीर स्थिर हो जाता है तो मन अपने आप स्थिर व एकाग्र हो जाता है । इसके लिए पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन, सरलासन, स्वास्तिकासन, समत्वासन या वज्रासन में से किसी एक पर बैठने का अभ्यास करें । अंगना भाव लाने के लिए पद्मासन सर्वोपरि है । इसके द्वारा मन भी बहुत सात्विक हो जाता है । सिद्धासन में बैठने पर मन में कोई विकारयुक्त बात नहीं सोचनी चाहिए, अन्यथा पतन की भी सम्भावना बन सकती है । सरलासन, सुखासन और समत्वासन पर लम्बे समय तक बैठने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना अति आवश्यक है ।

आसन से शरीर तो स्थिर हो जाता है परन्तु फिर भी मन पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाता । इसका कारण यह है कि आपकी स्वैच्छिक क्रिया तो शान्त हो गई परन्तु अनैच्छिक क्रियाऐं अभी भी चल रही हैं जैसे श्वास प्रक्रिया, हृदय स्पन्दन, आदि । इन क्रियाओं को रोका तो नहीं जा सकता, परन्तु धीमा अवश्य किया जा सकता है । उसका एकमात्र उपाय है प्राणायाम । विशेष प्रकार के प्राणायाम से अपनी श्वास प्रक्रिया को धीमा करके मन पर नियन्त्रण किया जा सकता है ।

नियमित प्राणायाम करने के अतिरिक्त चितवनि से तुरन्त पहले दो मिनट के लिए पीठ के बल लेटकर हल्के-हल्के भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए । जब नासिका के दोनों छिद्रों से श्वास निकले तब यह मान लेना चाहिए कि अब बाह्य सुष्मना प्रवाहित हो गयी है और यह ध्यान करने के लिए सर्वोत्तम समय है । इड़ा (बायें स्वर) तथा पिंगला (दाहिने स्वर) में से किसी एक के प्रवाहित रहने पर मन चंचल बना रहेगा और गहन ध्यान की स्थित प्राप्त नहीं हो सकेगी । बाह्य सुष्मना को प्रवाहित करके किसी भी समय चितवनि कर सकते हैं ।

यह प्रयास करें कि आप आसन पर बिना हिले-डुले कमर, पीठ तथा गर्दन को एक सीध में रखते हुए १ से ३ घण्टे तक बैठ सकें । यदि आप एक घण्टे तक बिना हिले-डुले लगातार बैठ सकते हैं और उससे अधिक बैठना चाहते हैं तो प्रति सप्ताह अपने आसन में पाँच मिनट की वृद्धि करते जायें । इस प्रकार एक वर्ष में ही आपके आसन में ४ घण्टे से अधिक वृद्धि हो जाएगी ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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