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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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प्रकास

यह ग्रन्थ गुजराती एवं हिन्दुस्तानी दोनों भाषाओं में है । प्रकाश गुजराती ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७१५ में हब्सा में हुआ था तथा प्रकाश हिन्दुस्तानी का अवतरण सम्वत् १७३६ में अनूपशहर में हुआ था ।

प्रकास ग्रन्थ में ८४ लाख योनियों में जन्म लेने के बाद मानव तन का महत्व बताते हुए माया-ब्रह्म के अन्तर का वर्णन है । इसके अतिरिक्त बेहदवाणी, प्रकटवाणी, भागवत सार, १०८ पक्षों का वर्णन, सदगुरु स्वरूप धाम धनी के विरह में तड़पने वाली आत्मा की मनोदशा का यथार्थ वर्णन है, जिसे पढ़कर हृदय के पट खुल जाते ह���ं । इस ग्रन्थ के माध्यम से यह बात स्पष्ट की गई है कि श्री महामति जी को ही इस संसार में सारी शोभा है ।

कतेब पक्ष की दृष्टि में इसे 'जंबूर' भी कहते हैं । जंबूर उस यन्त्र को कहते हैं जो धँसी हुई कील निकालता है अर्थात् अध्यात्म के उलझे हुए रहस्यों को स्पष्ट व प्रकाशित करना । दाउद के जंबूर ग्रन्थ के रहस्यों का स्पष्टीकरण इसी ग्रन्थ में है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा