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  निजानन्द दर्शन  »  ब्रह्म का स्वरूप कैसा है 

साकार और निराकार से परे ब्रह्म का स्वरूप

परब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में हो प्रकार की विचारधारायें हैं ।

पहली मान्यता के अनुसार परब्रह्म साकार हैं । अतः श्री नारायण (विराट पुरुष), कृष्ण, राम, शिव, विष्णु, हनुमान, दुर्गा, आदि के रूप में उनकी पूजा-आराधना की जाती है ।

इस प्रकृति में पाँच भूतों से युक्त किसी पदार्थ को साकार कहते हैं । किन्तु महाप्रलय में जब प्रकृति ही लय हो जाती है, तो लोक-लोकांतर (स्वर्ग, वैकुण्ठ, आदि) अथवा देवी-देवताओं (त्रिदेव, नारायण, आदि) के अस्तित्व का प्रश्न ही नहीं है । अतः परब्रह्म साकार नही हैं ।

दूसरी मान्यतानुसार परब्रह्म निराकार हैं । इस विचारधारा के अनुसार- परब्रह्म सर्वव्यापक , निर्गुण और निराकार हैं तथा ध्यान द्वारा उनका अनुभव किया जाता है ।

श्री प्राणनाथ जी का कथन है-

मोह अज्ञान भरमना , करम काल और सुंन ।

ये नाम सारे नींद के , निराकार निरगुन ।। (श्री मुख वाणी- क. हि. २४/१९)

कारण प्रकृति में विकृति से जिस महत्तत्व की उत्पत्ति होती है, उसे ही निराकार, निर्गुण, मोह, अज्ञान, भ्रम, कर्म, काल और शून्य के नाम से जाना जाता है ।

महत्तत्व का स्वरूप इतना सूक्ष्म होता है कि सामान्य मानवीय बुद्धि उसे ग्रहण ही नहीं कर पाती, जिस कारण उसे निराकार कहते हैं । निराकार की उत्पत्ति होती है तथा महाप्रलय में उसका नाश भी होता है । परन्तु परमात्मा तो चेतन, अनादि व अखण्ड हैं । अतः वह निराकार नहीं हो सकते ।

वस्तुतः साकार और निराकार से परे ब्रह्म का स्वरूप है, जो त्रिगुणातीत हैं । श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञान (जागृत बुद्धि) के बिना निराकार को पार कर उस स्वरूप तक नहीं पहुँचा जा सकता ।

हारे ढूंढ उपर तले , खुदा न पाया किन ।

तब हक का नाम निराकार , कह्या निरंजन सुनं ।। ( श्रीमुख वाणी- खु. १२/२ )

ब्रह्म की खोज करने वालों को जब ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हो पाया , तो उन्होंने विवश होकर उसे निराकार, निरंजन और शून्य कह दिया । 

"चलते चलते पग थके, नगर रहा नव कोश । बीच में डेरा पड़ गया, कबीर किन्हें देऊं दोष ।। जा घर में अबला बसे, बहे प्रेम के पूर । दास कबीरा यों कहे, सो घर हमसे दूर ।।" कबीर जी निराकार को पार कर योगमाया तक तो पहुँच गए परन्तु अक्षरातीत को न पा सके।

वेदों में कहीं भी परब्रह्म के लिए 'निराकार' शब्द नहीं है अपितु ब्रह्म को सर्वज्ञ माना गया है । विद्वानों के अनुसार ब्रह्म सर्वज्ञ तभी हो सकता है , यदि वह प्रकृति के अन्दर सर्वत्र हो , क्योंकि एकदेशीय अल्पज्ञ होता है । जो सर्वत्र विद्यमान होगा वह सर्वव्यापक होगा । अतः उसे सूक्ष्मतम और निराकार माना गया । परन्तु यदि एक सिद्ध योगी हजारों कि.मी. दूर से किसी भी स्थान का ज्ञान प्राप्त कर सकता है , तो परब्रह्म अपने धाम में स्थित रहकर सर्वज्ञ क्यों नहीं हो सकता ? धर्मग्रन्थों में ब्रह्म को व्यापक कहने का आशय यह है कि उसका स्वरूप प्रकृति से परे योगमाया के ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्यापक है । इसी प्रकार अक्षरातीत पूर्णब्रह्म का स्वरूप परमधाम के कण-कण में व्यापक है ।

वेद में कहा है- उस धीर, अजर, अमर, नित्य तरुण परब्रह्म को ही जानकर विद्वान पुरुष मृत्यु से नहीं डरता है (अथर्ववेद १०/८/४४ ) । इस मंत्र में अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म को नित्य तरुण ( युवा स्वरूप वाला ) कहा गया है, किन्तु उसका शरीर मनुष्यों के पंचभौतिक शरीर के लक्षणों से सर्वथा विपरीत है । ब्रह्म के युवा स्वरूप वाले शरीर में हड्डी, माँस, रस, रक्त तथा नस-नाड़ियाँ नहीं हैं । श्वास-प्रश्वास की क्रिया उनमें नहीं होती है और क्षुधा भी उसको नहीं सताती है । न उसमें रंच मात्र भी ह्रास होता है और न विकास । अनादि काल से उसका स्वरूप वैसा ही है और अनन्त काल तक रहेगा ।

वेदों में अन्य मन्त्रों में ब्रह्म के लिए शुक्र (नूर) , भर्गः , आदित्यवर्णः , कान्तिमान , मनोहर , प्रकाशमान , आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है । कान्ति एवं प्रकाश का मूल स्त्रोत कोई न कोई अलौकिक स्वरूप अवश्य होना चाहिए।

श्रीमुखवाणी में परब्रह्म के स्वरूप का कितना सुन्दर वर्णन है-

नूर को रूप सरूप अनूप है , नूर नैना निलवट नासिका नूर ।

नूर श्रवन गाल लाल नूर झलकत , नूर मुख हरवटी नूर अधूर ।। ( कि. ११४/१ )

अक्षरातीत श्री राज जी का स्वरूप उपमा से रहित नूरमयी है । उनके नेत्र , मस्तक और नासिका भी नूरी छवि वाली है । उनके सुन्दर कानों तथा लाल गालों से हमेशा ही नूर झलकता रहता है । उनका मुखारविन्द , ठुड्ढी और लाल होंठ भी नूरमयी ही हैं ।

सामवेद में कहा है कि जो अपने गृह रूपी चेतन धाम में सम्यक् प्रदीप्त होकर चमकता है उस अत्यन्त तरुण, अद्भुत प्रभा वाले, अपने चेतन धाम में सर्वत्र व्यापक, महान, पृथ्वी और द्युलोक के बीच उत्तम प्रकार से स्तुति किए गए ब्रह्म को हम महानम्रता द्वारा प्राप्त हुए हैं (साम. ५/८/९/१) । जो ब्रह्म का स्वरूप है, वही उसके धाम का भी स्वरूप है । अक्षरातीत पूर्णब्रह्म का स्वरूप जिस प्रकार नूरमयी और प्रेममयी है, उसी प्रकार सम्पूर्ण परमधाम भी नूरमयी और प्रेममयी ही है ।

( इस सम्बन्ध में विशेष विवेचना के लिए श्री राजन स्वामी कृत 'सत्याञ्जलि' ग्रन्थ पढ़ें )

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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