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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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परिकरमा

परिकरमा ग्रन्थ का अवतरण श्री पन्ना धाम में हुआ । इसमें उस अलौकिक परमधाम का वर्णन है जो सत्य, चेतन, तेजमयी, अनन्त प्रेम और आनन्द से युक्त, अनन्त परिधि वाला तथा स्वलीला अद्वैत है ।

अक्षर ब्रह्म व अक्षरातीत परब्रह्म के मूल स्वरूप जिस दिव्य धाम में विराजमान हैं, उसका स्पष्ट वर्णन आज तक इस ब्रह्माण्ड में नहीं हो सका था । सभी उसे शब्दातीत व अगम कहकर मौन हो गए क्योंकि स्वप्न की बुद्धि वहाँ तक नहीं पहुँच सकती । पुराण संहिता और माहेश्वर तन्त्र में शिव जी ने जिस धाम को अक्षरातीत का परमधाम मानकर वर्णन किया है, वह केवल ब्रह्म (योगमाया) का ही वर्णन है, परमधाम का नहीं । वेद और क़ुरआन में सांकेतिक रूप में परमधाम का वर्णन अवश्य है । वेदों में उसे 'दिव्य ब्रह्मपुर' तथा क़ुरआन में उसे 'अर्शे अज़ीम' व 'लाहूत' कहकर पुकारा गया है । किन्तु उनके संकेतों को तारतम ज्ञान के बिना कोई समझ नहीं सकता ।

उस अगम परमधाम का विस्तृत व स्पष्ट वर्णन तो स्वयं पूर्णब्रह्म अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने ही इस ग्रन्थ में किया है । अक्षरातीत के अनादि परमधाम में सात परिक्रमायें वर्णित हैं- १. रंगमहल २. हौजकौसर, पुखराज, फूलबाग, नूरबाग, बट-पीपल की चौकी ३. माणिक पहाड़ ४. जवेरों की नहरें ५. वन की नहरें ६. छोटी रांग- चार हार हवेली ७. आठ सागर- आठ जिमीं । इन्हीं सात परिक्रमाओं का सविस्तार वर्णन करने हेतू प्रकटे इस ग्रन्थ को 'परिकरमा' कहा गया है ।

इस ग्रन्थ में शब्दातीत परमधाम के अनन्त विस्तार एवं शोभा को अति सीमित करके शब्दों में लाने का प्रयास किया गया है, ताकि वह इस स्वप्न की बुद्धि में समा सके । इसमें उस अलौकिक धाम का ऐसा सजीव वर्णन है कि पढ़ने मात्र से ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ का दृश्य आँखों के समक्ष उपस्थित हो गया है । परमधाम में होने वाली अष्ट प्रहर की लीला का भी अति मनमोहक वर्णन है ।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री परिकरमा के सरल भाष्य को पढ़ें)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा