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कपि मार्ग

कपि का अर्थ होता है बन्दर । जिस प्रकार एक बन्दर कूदते-फाँदते हुए तेजी से किसी मार्ग को पार करता है, उसी प्रकार इस मार्ग पर समय कम लगता है । यह पिपीलिका मार्ग से श्रेष्ठ परन्तु कठिन है । इसे ही योग कहते हैं । योग की पाँच भूमिकाएँ होती हैं ।

हठयोग के अन्तर्गत आने वाली बन्ध, मुद्रा, प्राणायाम आदि साधनाओं से तथा नादयोग, लययोग, कुण्डली आदि के जागरण से निराकार प्रकृति से परे नहीं हुआ जा सकता क्योंकि जड़ समाधि की पहुँच महाशून्य ( निराकार प्रकृति ) से आगे नहीं है ।

ऋषि पतंजलि ( योग दर्शन के रचयिता ) के राजयोग ( अष्टांग योग ) द्वारा आत्म साक्षात्कार की स्थिति प्राप्त की जाती है । सम्प्रज्ञात समाधि द्वारा प्रकृति की अन्तिम सीमा (महत्तत्व) तक का साक्षात्कार हो जाता है । सम्प्रज्ञात समाधि के पश्चात् असम्प��रज्ञात समाधि की स्थिति मानी जाती है, जिसे निर्बीज समाधि भी कहते हैं । असम्प्रज्ञात समाधि में महत्तत्व भी प्रकृति में लीन हो जाता है और चेतन जीव की चित्ति शक्ति केवल अपने स्वरूप मात्र में स्थित रह जाती है ( योग दर्शन ४/३४ ) । इसी कारण इस अवस्था को 'कैवल्य' कहते हैं । यह योग की चौथी भूमिका तथा योग दर्शन की सर्वोत्तम उपलब्धि है । इससे भी ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं होता ।

योग की पाँचवी तथा अंतिम भूमि में जीव कैवल्य का भी अतिक्रमण करके अपनी शुद्ध 'हंस' अवस्था में स्थित होता है । जीव का यह शुद्ध स्वरूप (हंस) परमगुहा में पहुँच कर ब्रह्म का साक्षात्कार करता है (अथर्ववेद २/१/१) । उपनिषद् , वेद , वेदान्त आदि में केवल परम गुहा (एकादश द्वार) में ही ब्रह्म के साक्षात्कार का वर्णन है, अन्य नहीं । यह वेद का सबसे गुह्य योग मार्ग है । कबीर जी द्वारा प्रवर्तित सूरति-शब्द योग भी यही मार्ग है । परन्तु परम गुहा में भी ब्रह्म (अक्षर ब्रह्म) के मूल स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता अपितु उनकी त्रिपाद विभूति ( सबलिक, केवल तथा सत्स्वरूप ) का ही साक्षात्कार होता है (अथर्ववेद २/१/२) ।

वेद का कथन है कि अक्षर ब्रह्म का मूल स्वरूप त्रिपाद अमृत अर्थात् योगमाया के ब्रह्माण्ड से भी परे है (यजुर्वेद ३१/४) । अक्षरातीत परब्रह्म उस अविनाशी अक्षर से भी परे हैं (मुण्डकोपनिषद् २/१/२/४) । अतः वैदिक योग पद्धति की पराकाष्ठा (अंतिम उपलब्धि ) अक्षर ब्रह्म के चारों पादों से ही सम्बन्धित है । इससे अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हो सकता है ।

इस विषय पर श्री प्राणनाथ जी कहते हैं-                                         

रे  हूं  नाहीं  करामात  मत  अगम  निगम ,   धरम  न  करम  उनमान ।

सुपन   सुषुप्त   जाग्रत   न   तुरिया,      तप   न   जप  न  ध्यान ।। ( श्री मुख वाणी- कि. ११/३ )

योग साधना से प्राप्त होने वाले चमत्कारों के प्रदर्शन , वेद शास्त्रों के सिद्धान्तों के ग्रहण , अनुमानपूर्वक धर्म एवं कर्मयोग को ही ब्रह्म साक्षात्कार मानने वालों से मै अलग हूँ । जीव के जागृत , स्वप्न , सुषुप्ति तथा समाधि की तुरीय अवस्था में होने वाली अनुभूतियों , जप , तप, तथा साकार एवं निराकार के ध्यान को भी मै परब्रह्म प्राप्ति नहीं मानता ।

आगम  भाखो  मन  की   परखो ,    सूझे   चौदे   भवन ।

मृतक  को  जीवत  करो ,  पर  घर  की  न  होवे  गम ।। ( श्री मुख वाणी- किरन्तन १४/१० )

तुम इतने सिद्ध बन जाओ कि योग द्वारा भविष्य की सारी बातें जानने लगो , दूसरों के मन की बात भी जान जाओ , चौदह लोकों का सारा दृश्य भी देखने लगो तथा मरे व्यक्तियों को जीवित करने लगो , फिर भी तुम्हे अखण्ड घर की पहचान नहीं हो सकती ।

अन्ततः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि योग मार्ग कठिन तथा ब्रह्म साक्षात्कार कराने में अक्षम है । आगे बढ़ने के लिए कोई अन्य मार्ग चाहिए ।

( विस्तृत अध्ययन के लिए श्री राजन स्वामी कृत ग्रन्थ "सत्याञ्जलि" पढ़ें )

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा