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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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मारफत सागर

'मारफत सागर' ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७४८ में श्री पन्ना धाम में हुआ । हिन्दुस्तानी भाषा में प्रकटे इस ग्रन्थ में मारिफ़त ज्ञान (परम सत्य, विज्ञान) का वर्णन है । इसी आधार पर इसका नाम 'मारफत सागर' रखा गया । इसमें आध्यात्मिक जगत के गुह्य रहस्यों तथा क़ुरआन के अब तक छुपे रहस्यों का स्पष्टीकरण है ।

अल्लाह तआला (अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी) ने मेअराज (साक्षात्कार) के समय अर्श-ए-अज़ीम (परमधाम) में मुहम्मद साहेब (अक्षर ब्रह्म की आत्मा) से वादा किया था कि वह स्वयं पृथ्वी पर आकर मारिफत ज्ञान प्रकट करेंगे । मुहम्मद साहेब को क़ुरआन के रूप में शरीअत (कर्मकाण्ड) व तरीक़त (उपासना) का ज्ञान प्रकट करने की छूट थी, परन्तु हक़ीकत व मारिफ़त ज्ञान वर्णन करने की शोभा स्वयं परब्रह्म अक्षरातीत की है । यह मारिफ़त का ज्ञान क़ुरआन के ताले (रहस्यों) की कुंजी है ।

इस ग्रन्थ में अर्श (परमधाम) में अल्लाह (श्री प्राणनाथ जी) व उनकी रूहों (आत्माओं) में होने वाले इश्क-रब्द के प्रसंग का वर्णन है । लैल-तुल-कद्र की रात्रि की व्याख्या है । इसमें क़ियामत के सातों निशानों- सूरज का मगरब (पश्चिम) में उगना, दाभ-तुल-अरज़ (सबसे बड़े जानवर) का पैदा होना, याजूज-माजूज का जाहिर होना, काने दज्ज़ाल का प्रकट होना, इस्राफील का सूर फूँकना, रूह अल्लाह और इमाम महदी के प्रकट होने के प्रसंगों का वास्तविक आशय स्पष्ट किया गया है । इसके अतिरिक्त छह दिन की पैदाइश और अज़ाजील, ज़िबरील व इस्राफील फरिश्तों की वास्तविकता का भी वर्णन किया गया है ।

यह 'मारफत सागर' ज्ञान का ऐसा सूर्य है, जिसके प्रकट होने के बाद अन्य ग्रन्थों की आवश्यकता नहीं रहती ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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