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परमधाम का प्रेम संवाद

पुराण संहिता ग्रन्थ के अध्याय २२ में अक्षर ब्रह्म व अक्षरातीत के चरित्र का सुन्दर चित्रण किया गया है । 

अक्षर ब्रह्म पूर्ण अखण्ड, प्रकृति के गुणों से रहित, आसक्ति रहित और प्रकृति से परे है ।।४४।। इसी प्रकार वह अनादि परब्रह्म सत् चित् और आनन्द लक्षणों वाला है । रस तथा रूप के भेद से वह नित्य ही अलग स्थित है ।।५१।। उपमा से रहित, स्वलीला अद्वैत तथा इन्द्रियों से प्रत्यक्ष न होने वाला वह परब्रह्म अति प्रेममयी स्वरूप को धारण करने वाला है तथा आत्मा रूप सखियों का अति प्यारा परम तत्व है ।।५३।। उस प्रेममयी परम तत्व को धारण करने, प्यार करने तथा रस लेने में सखियां प्रत्यक्ष रूप समर्थ नही हैं । अतः उनसे प्रेम क्रीड़ा करने के लिए उनके ही अलग रूप में स्वामिनी (श्री श्यामा जी) प्रथम अंग हैं ।।५४।।

अक्षर ब्रह्म के हृदय को प्रेम एवं आनन्द की हिलोरें लेने वाले सागर के स्वभाव से रहित जानना चाहिए, जो मात्र ज्ञान के स्वरूप हैं और बालक की तरह सृष्टि को बनाने और संहार करने की लीला करते हैं ।।५९।। इसलिए उस अक्षर ब्रह्म को परमधाम में प्रवेश की इच्छा उत्पन्न करने के लिए अखण्ड रूप में प्रेम का अंश अल्प मात्रा में स्थित रहता है ।।६१।। एक बार अक्षर ब्रह्म अक्षरातीत परब्रह्म का दर्शन करने के लिए परमधाम में गये ।।६५।। परमधाम की लीला देखने की इच्छा वाले अक्षर ब्रह्म ऊपर दृष्टि किए हुए अनन्त हृदय से केवल उस रंगमहल की भूमिका की ओर ही देखते हुए बहुत अधिक समय तक खड़े रहे । उस समय तीसरी भूमिका में विराजमान अक्षरातीत नृत्य और गान में तल्लीन सखियों से घिरे हुए थे ।।६६,६७।। उन्हें देखकर अक्षर ब्रह्म भौंचक्का होते हुए मोहित मन वाले हो गए । तब उन्होंने अपने मन में यह विचार किया कि अहो ! यह कितनी अद्भुत छवि है ।।७४।। यह लीला अतुलनीय रहस्य वाली है । देखने के लिए व्याकुल मैं उसे कैसे देख सकता हूँ । यदि अक्षरातीत मेरे ऊपर कृपा करें तो मै उसे देख भी सकता हूँ ।।७९।।

अध्याय २३ में अक्षरातीत व उनकी आत्माओं के बीच, अखण्ड परमधाम (अखण्ड योगमाया से परे दिव्य ब्रह्मपुर धाम) में, हुए प्रेम-विवाद का भी सांकेतिक वर्णन है, जो निम्नलिखित है-

इसी प्रकार अक्षरातीत की प्रियाओं (आत्माओं) ने कहा- हे नाथ ! इस पूर्ण आनन्दमयी धाम में भला क्या दुर्लभ हो सकता है ? फिर भी हे नाथ ! आपकी प्रियाओं में एक बहुत बड़ी इच्छा है ।।५१।। हे प्रियतम ! इस इच्छा की व्याकुलता हमें बहुत अधिक पीड़ा दे रही है । उसे पूरा करके हमें कष्ट से मुक्त कीजिए । अक्षर ब्रह्म की प्रकृति की जो विचित्र लीला है, उसे देखने की इच्छा हमारे चित्त को व्याकुल कर रही है । अब बिना कुछ भी विचार किए आज ही हमें उस लीला का दर्शन कराइए ।।५२,५३।।

अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म अपनी आत्माओं से कहते हैं, प्रकृति की लीला मोहित करने वाली तथा अपने अमृतमयी आनन्द रूपी दीवाल को स्याही की तरह काली करने वाली है, जहां केवल प्रवेश करने मात्र से अपनी बुद्धि नहीं रहती है ।।५६।। पांच तत्वों से बने हुए शरीर को ही अपने आत्मिक रूप में माना जाता है, जिससे आत्मिक गुण तो छिप जाते हैं ।।५७।। और उनकी जगह मोह जनित दोष पैदा हो जाते हैं । हे सखियों ! तुम वहां जाकर माया के ही कार्यों को करोगी । जिस माया में आत्मा के आनन्द को हरने वाली तृष्णा रूपी पिशाचनी है ।।५८।। जहां काम, क्रोध, आदि छः शत्रु स्थित हैं, जो जीव को पाप में डूबोकर तथा क्रूर कर्म कराकर उसे बलहीन करके लूट लेते हैं ।।५९।। वहां जाकर तुम यहां के अपने स्वाभाविक गुणों, सौन्दर्य और चतुरता के विपरीत हो जाओगी । मुझे तुम कहीं भी नहीं देखोगी और हमेशा ही मुझको भूली रहोगी ।।७८।।

इसी प्रकार का वर्णन नारद पञ्चरात्र के अन्तर्गत माहेश्वर तन्त्रम् में भी किया गया है । क़ुरआन में वर्णित 'अलस्तो विरब्ब कुंम' का कथन भी इसी इश्क रब्द (प्रेम विवाद) की ओर संकेत करता है ।

परमधाम के इस प्रेम संवाद के कारण आत्माओं के साथ परब्रह्म को अनहोनी घटना के रूप में ब्रज, रास एवं जागनी ब्रह्माण्ड (इस अट्ठाइसवें कलयुग) में आना पड़ा । संसार में प्रकटन का लक्ष्य आत्माओं को दुःख का खेल दिखाना व अक्षर ब्रह्म को परमधाम की अलौकिक प्रेम लीला का आभास कराना है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा