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औरंगज़ेब का आज़म को अन्तिम पत्र

अल्लाह तुम्हे शान्ति बख्शे,

बुढ़ापा आ गया है और कमजोरी निरंतर बढ़ रही है, मेरे पुठ्ठों में ताकत नहीं रही । मै अकेला आया था और अकेला जा रहा हूँ । मै नहीं जानता कि मै कौन हूँ और मै क्या करता रहा हूँ ।

आत्मसंयम के दिनों के अलावा जो मेरी जिंदगी के दिन गुजरे हैं, उनके लिए मुझे खेद और पछतावा है । मैने राज्य को कतई सच्ची, पालन-पोषण करने वाली सरकार नहीं दी ।

मेरा अमूल्य जीवन व्यर्थ में ही चला गया । मेरे घर 'मालिक' (इमाम महदी) आये थे, परन्तु मेरी अंधी आँखें उसका तेज प्रताप नहीं देख सकी । जीवन का अंत नहीं होता । उन वाक्यों का कोई अवशेष नहीं है, वे अब नहीं है और न ही भविष्य में कोई आशा है ।

मेरा बुखार भाग गया, और पीछे चमड़ी और हड्डियों का ढांचा छोड़ गया है । मेरा पुत्र कमबख्श जो बीजापुर गया हुआ था मेरे नजदीक है । प्रिय शाह आलम सबसे दूर है । पोता महमूद अज़ीम ख़ुदा के हुक्म से बंगाल से चलकर हिन्दुस्तान के नजदीक है ।

सभी सिपाही सलाए मेरी तरह से असहाय, व्याकुल और घबराये हुए हैं, जिन्होंने मेरे मालिक (इमाम महदी) को पीठ दी । मै अब आशंका और कम्पन की स्थिति में हूँ, पिघलती हुई चाँदी की तरह ।

उन्होंने सोचा नहीं कि कभी हमारा परवरदिगार हमारे साथ था । मै दुनिया में अपने साथ कुछ नहीं लेकर आया और मेरे द्वारा किये पापों का प्रतिफल उठा कर जा रहा हूँ । मैं जानता नहीं क्या सजा मेरे ऊपर आनी है । यद्यपि मुझे उस की महानता और मेहर की आशा है वरन् मेरे कर्म और महत्वकांक्षा मुझे नहीं बख्शेंगे । जब मै अपने आप से जुदा हो रहा हूँ तो कौन मेरे साथ रहेगा ?

             हवा का रूख कैसा भी हो

                           मैं पानी में नाव से प्रस्थान कर रहा हूँ ।

यद्यपि परवरदिगार अपने बंदों का पोषण करेगा फिर भी दुनियावी तौर पर मेरे बच्चों का कर्त्तव्य है कि वे देखें कि खुदा बन्दे तआला के बनाये बाशिन्दों और मुसलमानों को निर्दयता से न मारा जाये ।

मेरे पोते बहादुर बिदर बख्त को मेरा अलविदा आशीर्वाद देवें । मेरे जाने के वक्त मै उसको नहीं देख सकता, उससे मिलने की इच्छा से मै असन्तुष्ट रहूँगा । यद्यपि बेगम दिखने मात्र को है, परन्तु दुःखों से पीड़ित । फिर भी परमात्मा दिलों का मालिक है । अदूरदर्शिता का नतीजा निराशा के सिवा कुछ नहीं होता ।

अलविदा              अलविदा               अलविदा

औरंगज़ेब का इतिहास
यदुनाथ सरकार द्वारा लिखित
भाग ५ , पृष्ठ संख्या २१०
 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा