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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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किरन्तन

किरंतन का तात्पर्य 'कीर्तन' से है । इस ग्रन्थ में श्री कुलजम स्वरूप के सभी तत्वों व विषयों का समावेश है, जिस कारण यह उसका एक लघु रूप है ।

यह ग्रन्थ हिन्दुस्तानी, गुजराती एवं सिन्धी भाषा में है । किरन्तन ग्रन्थ का अवतरण काल सम्वत् १७१२ से १७५१ है । यद्यपि १७४८ में मारफत सागर ग्रन्थ के अवतरण के पश्चात् वाणी का अवतरण लगभग पूर्ण हो गया, परन्तु उसके बाद भी किरन्तन ग्रन्थ के कुछेक प्रकरण उतरते रहे जो धाम चलने (चितवनि) से सम्बन्धित हैं ।

श्री प्राणनाथ जी जागनी कार्य हेतु जहाँ-जहाँ गये, वहाँ के विद्वानों, सन्यासियों तथा जिज्ञासुओं से जो वार्ता, शास्त्रार्थ, सत्संग, आदि हुआ, उस स्थिति के अनुसार ही परब्रह्म के आवेश से किरन्तनों का अवतरण हुआ । अतः इन किरन्तनों में विषयानुसार अध्यात्म के सभी पक्षों का वर्णन है ।

किरन्तन ग्रन्थ में श्री प्राणनाथ जी को ही श्री विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक स्वरूप उद्घोषित किया गया है ।

इसमें वेद, दर्शन शास्त्र व वेदान्त के उन गूढ़ रहस्यों का स्पष्टीकरण हुआ है, जिसे सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक कोई नहीं बता सका था । यह ग्रन्थ ज्ञानीजनों व योगियों के मन के सभी संशयों को मिटाकर उन्हें माया-ब्रह्म की स्पष्ट पहचान कराता है । निष्पक्ष हृदय तथा ब्रह्मज्ञान की लालसा से युक्त कोई भी सच्चा जिज्ञासु इस ज्ञान को पाकर धन्य हो जायेगा ।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री किरन्तन का सरल भाष्य पढ़ें-

   हिन्दी , English )

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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