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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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खिलवत

'खिल्वत' का शाब्दिक अर्थ होता है अन्तःपुर । यह अरबी भाषा का 'खल्वत' शब्द है, जिसका तात्पर्य है एकान्त स्थान । यह वह स्थान है जहाँ आशिक और माशूक (प्रेमी और प्रेमास्पद) अपनी प्रेम लीला को क्रियान्वित करते हैं ।

बाह्य रूप में खिल्वत किसी स्थान विशेष को मान सकते हैं, किन्तु आन्तरिक रूप में आशिक और माशूक का दिल (हृदय) ही वास्तविक खिल्वत की संज्ञा प्राप्त करता है ।

चिदघन स्वरूप अक्षरातीत का हृदय इश्क का गंजानगंज सागर है । उससे प्रकट होने वाले आनन्द के सागर की लहरों के साथ होने वाली क��रीड़ा ही प्रेम और आनन्द की लीला है ।

आध्यात्म की सर्वोच्च मंजिल मारिफत तक पहुँचने में खिल्वत ग्रन्थ एक सोपान है । इसमें उस ब्रह्मानन्द लीला की एक झलक सी दिखायी गई है, जिससे इस नश्वर जगत में परमधाम का कुछ आभास मिल सके ।

इस ग्रन्थ का अवतरण श्री पन्ना जी में हुआ । प्रारम्भ के पाँच प्रकरणों में 'मै खुदी' (अहं) को त्यागने का विशेष वर्णन है । तत्पश्चात् स्वलीला अद्वैत परब्रह्म का अपनी आत्माओं तथा आनन्द के स्वरूप श्री श्यामा जी से होने वाले अलौकिक इश्क-रब्द (प्रेम-प्रसंग) का सविस्तार वर्णन किया गया है । इसमें स्पष्ट किया गया है कि परमधाम के जर्रे-जर्रे में अक्षरातीत का इश्क, आनन्द और वाहेदत (एकदिली) समायी हुई है ।

संसार के प्रपंचों से हटाकर आत्मा को परमधाम की ओर ले जाना ही इस ग्रन्थ का मुख्य आशय है ।

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री खिलवत के सरल भाष्य को पढ़ें)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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