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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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खटरूती

यह पूरा ग्रन्थ गुजराती भाषा में है । एक वर्ष में ६ ऋतुएँ होती हैं- ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर और वसन्त । प्रत्येक ऋतु में आत्मा अपने प्रियतम अक्षरातीत से मिलने के लिए विरह में किस प्रकार तड़पती है, उसका प्रत्यक्ष वर्णन इस ग्रन्थ में किया गया है ।

यह सम्पूर्ण ग्रन्थ विरह रस में ओत-प्रोत है । वस्तुतः श्री इन्द्रावती जी के द्वारा अनुभव किये गये दो प्रकार के विरह का इसमें वर्णन है । पहला, जब श्री मिहिरराज जी अपने सदगुरु धनी श्री देवचन्द्र जी से अलग होकर अपने भाई के घर रहते हैं और उनके अन्दर विराजमान श्री इन्द्रावती जी की आत्मा सदगुरु धनी श्री देवचन्द्र जी से मिलने के लिए तड़पती है, परन्तु मिल नहीं पाती । दूसरा, जब सुन्दरसाथ की सेवा जैसे पुनीत कार्य में विघ्न पड़ता है और श्री मिहिरराज जी को बिना कारण हब्सा भेज दिया जाता है, तब अन्दर विराजमान श्री इन्द्रावती की आत्मा असह्य दुःख के कारण अपने प्रियतम अक्षरातीत श्री राज जी के साक्षात्कार के लिए तड़पती है तथा बार-बार पुकारती है ।

 

(श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, श्री राजन स्वामी द्वारा किये गये श्री खटरुती का सरल भाष्य पढ़ें।)

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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