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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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कलस

कलस ग्रन्थ में अखण्ड ब्रज, अखण्ड रास (योगमाया) व बुद्ध अवतार का वर्णन है जिससे श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पहचान होती है । इसमें प्रेम, विरह, परब्रह्म अक्षरातीत की कृपा, परमधाम की आत्माओं के लक्षण तथा उनकी जागनी का अति सुन्दर वर्णन है । इसके अतिरिक्त संसार के ज्ञानीजनों के भटकाव का सुन्दर चित्रण करते हुए हिन्दू धर्म के अनेक रहस्यों का स्पष्टीकरण किया गया है । जिस प्रकार मंदिर की गुमटी पर कलश शोभायमान होता है, उसी प्रकार यह ग्रन्थ सभी हिन्दू ग्रन्थों पर कलश के समान सुशोभित है ।

यह ग्रन्थ गुजराती एवं हिन्दुस्तानी दोनों भाषाओं में है । यद्यपि कलश गुजराती की दो चौपाइयाँ हब्सा के अन्दर सम्वत् १७१५ में ही उतर गयी थीं, किन्तु इसका पूर्ण अवतरण सम्वत् १७२९ में सूरत में हुआ । कलश हिन्दुस्तानी का अवतरण सम्वत् १७३६ में अनूपशहर में हुआ ।

कतेब पक्ष की दृष्टि में इसे 'तौरेत' भी कहे जाता है । तौरेत ग्रन्थ के रहस्यों का स्पष्टीकरण इसी ग्रन्थ में है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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