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सूरत की बीतक

सम्वत् १७२८ में श्री प���राणनाथ जी अरब से वापस ठट्ठानगर आ गये । इसके पश्चात् सूरत में सत्रह माह रहे । श्री जी के मुखारविन्द से होने वाली चर्चा का शोर सारे सूरत में फैल गया । भीम भाई और श्यामभाई जैसे वेदान्त के आचार्य भी ब्रह्मवाणी की चर्चा सुनने आने लगे । श्याम भाई ने स्वीकार किया कि श्री प्राणनाथ जी ने वेदान्त के उन गुह्यतम रहस्यों का व्यक्त किया है जिनका आज तक कभी स्पष्टीकरण नहीं हो पाया था । भीम भाई भी विचार करने लगे कि हम सब तो अब तक क्षर पुरुष आदि नारायण को सर्वश्रेष्ठ मानते थे, किन्तु ये तो क्षर से परे अक्षर ब्रह्म तथा उनसे भी परे अक्षरातीत का लीला का वर्णन कर रहे हैं । श्री जी की कृपा से भीम भाई की आत्मिक दृष्टि परमधाम का अनुभव करने लगी ।

वल्लभाचार्य मत में गोविन्द जी व्यास नामक एक विद्वान थे । उन्हें भागवत में वर्णित ४० प्रश्नों का उत्तर नहीं आता था । श्री प्राणनाथ जी से भेंट होने पर वे उन प्रश्नों को पढ़ते गये तथा श्री जी साथ-साथ उत्तर देते गये । थोड़ी ही देर में सभी प्रश्नों का समाधान हो गया । व्यास जी अवाक् रह गये । श्री प्राणनाथ जी के चरणों में नतमस्तक होते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि इन प्रश्नों का उत्तर देने वाला कोई मानव नहीं है, अपितु स्वयं परब्रह्म इस मनुष्य तन में बैठकर लीला कर रहे हैं ।

सूरत में पहली बार सभी सुन्दरसाथ ने एक स्वर से भीम भाई के नेतृत्व में प्राण प्रियतम श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप को अक्षरातीत परब्रह्म मानकर उनकी आरती उतारी और अपना तन, मन, धन उनके चरणों पर समर्पित कर दिया ।

भीम भाई, श्याम भाई और गोविन्द व्यास जैसी विभूतियों के तारतम ज्ञान ग्रहण करने से चारों ओर शोर मच गया । सैंकड़ों लोगों ने अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझाई । सूरत से ही बहुत से सुन्दरसाथ ने अपना घर हमेशा के लिये छोड़ दिया और श्री प्राणनाथ जी के साथ जागनी अभियान पर निकल पड़े । ठट्ठानगर के सेठ लक्ष्मण दास परिवार सहित श्री जी की शरण में आ गये । अब्बासी बन्दर के गोवर्धन भाई अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर सदा के लिये श्री जी के चरणों में आ गये तथा सुन्दरसाथ के खर्च की सेवा अपने ऊपर ले ली ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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