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 श्री राम रतन दास जी

 विक्रम सम्वत् १९५१ से २०२१

 

 

संक्षिप्त जीवन परिचय

अज्ञानता के अन्धकार से परिपूर्ण इस जगत में सच्चिदानन्द परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेना जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि है । ब्रह्ममुनियों के समाज में परमहंस महाराज श्री राम रतन दास जी का जीवन वृत्त एक ऐसे उज्जवल नक्षत्र की तरह है, जो सभी सुन्दरसाथ को अपनी ओर सम्मोहित किये हुये है । आप परमहंस महाराज श्री गोपालमणि जी की परम्परा में ही आते हैं ।

महाराज श्री राम रतन दास जी सम्वत् १९७० में मात्र १९ वर्ष की अवस्था में अपनी जन्मभूमि (जड़ौदा पाण्डा जिला सहारनपुर उ.प्र.) को छोड़कर चल दिये । हृदय में अपने प्रियतम अक्षरातीत को पाने की तड़प थी । कोई सच्चा मार्गदर्शक न मिल पाने के कारण, वे पैदल चलते हुए जगन्नाथ जी के दर्शन हेतु पुरी पहुँचे । वहाँ पर पण्डों और व्यवस्थापकों का व्यवहार अति कटु था । जड़ मूर्ति के दर्शन से उनकी प्यास नहीं मिटी और मंदिरों के प्रति अश्रृद्धा हो गयी । एक ब्रह्मनिष्ठ, पूर्ण सदगुरु की उन्हें चाहना थी, जो धाम धनी का दीदार करावे ।

परमहंस महाराज जी वहां से दक्षिण भारत की तरफ चल दिये । मार्ग में वे कई-कई दिन के अन्तराल पर भोजन करते थे । एक बार तो उन्होंने आठ दिन केवल जल पर ही गुजारे । शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था । दिन भर पैदल चलना और रात्रि में वृक्षों के नीचे ध्यान करना ही उनकी दिनचर्या थी । ऐसे भी दिन आये, जब उनकी कमर में दो अंगुली की लंगोटी भी नहीं रही । अति कठोर साधना में समय बीतते-बीतते उन्हें दो बार शिव जी तथा एक बार हनुमान जी का साक्षात्कार हुआ, किन्तु महाराज जी ने उनके प्रति कोई लगाव नहीं रखा क्योंकि उन्हे तो केवल अक्षरातीत की चाहना थी ।

जगन्नाथ पुरी से चलकर महाराज जी बालाजी, ऋष्यमुक पर्वत, दाहोद, गोधरा, अजमेर, पुष्कर होते हुए दो वर्ष बाद घर वापस आये । अपने ग्राम से बाहर दूसरे जूड़ ग्राम में वे छः वर्ष तक साधनारत रहे । इसके पश्चात् सम्वत् १९७८ में इस दृढ़ निष्ठा के साथ उन्होंने गृहत्याग किया कि इस बार या तो अपने प्रियतम धाम धनी को पा लेंगे या अपना शरीर छोड़ देंगे ।

पहले वाले मार्ग पर चलते-चलते महाराज जी महाराष्ट्र प्रान्त में सोनगिरि पहुँचे । वहां पर सदगुरु श्री नारायण दास जी के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने अपना सर्वस्व सदगुरु चरणों में समर्पित कर दिया । जिस अक्षरातीत परब्रह्म को वे बड़ी-बड़ी कठोर साधनाओं से भी नहीं पा सके थे, उन्हें अपने सदगुरु महाराज जी की कृपा दृष्टि से उन्होंने सरलतापूर्वक अपने दिल में बसा लिया । श्री प्राणनाथ जी के ज्ञान व चितवनि की अनमोल सम्पदा से आपने सब कुछ प्राप्त कर लिया । उनके पास इतना आत्मिक बल आ गया कि वे जो कुछ चाहते या कह देते, वही होता था । इसी क्रम में उन्होंने एक मरे हुए बालक को भी जीवित कर दिया था, जिसके कारण उन्हें अपने सदगुरु महाराज से झिड़की भी सुननी पड़ी ।

अपने सदगुरु से विदा लेकर कलकत्ता, नेपाल, आदि घूमते हुये जब वे सम्वत् १९८४ में अपनी जन्मभूमि वापस आये तो उनकी आयु ३३ वर्ष से भी कम थी अर्थात् इतनी अल्प आयु में ही उन्होंने अपनी आत्मा के हृदय में अक्षरातीत पूर्णब्रह्म को बसा लिया था । सदगुरु की कृपा से अपनी अटूट निष्ठा, कठोर साधना और आत्मिक प्रेम के बल पर इतनी कम आयु में उन्हें परमहंस अवस्था प्राप्त हो गयी, जिसके लिए प्रायः ४० वर्ष की आयु होने की बाट देखी जाती है ।

अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी की कृपा से उन्होंने शेरपुर ग्राम के बाहर श्री निजानन्द आश्रम की स्थापना की । एक आध्यात्मिक ज्ञान केन्द्र के रूप में स्थापित इस आश्रम में वर्षों तक सुन्दरसाथ का मधुर समागम तथा आत्मोत्थान होता रहा । पाकिस्तान से विस्थापित हिन्दू सुन्दरसाथ को यहां प्रेमपूर्वक आश्रय मिला । इस आश्रम के माध्यम से ३५ वर्षों से भी अधिक समय तक स्वयं महाराज जी ने सुन्दरसाथ की सेवा की ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि परमहंस महाराज श्री राम रतन दास जी के चरणों में जो भी एक बार गया, वह उन्हीं का होकर रह गया । अध्यात्म की सर्वोच्च ऊँचाई पर पहुँचने के बाद भी उनमें इतनी विनम्रता थी कि सुन्दरसाथ का जूठन खाने में भी उन्होंने गर्व का अनुभव किया । अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर उन्होंने अनेक सुन्दरसाथ की आत्माओं को परमधाम का दर्शन कराया । उनकी आत्मा स्वयं हमेशा परमधाम में विचरण किया करती थी । महासमाधि के ५० वर्ष बाद भी परमहंस महाराज जी को सभी सुन्दरसाथ वैसे ही याद करते हैं ।

(महाराज जी की विस्तृत जीवनी पढ़ने के लिए प्रेम का चाँद पढ़ें)

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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