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  महान व्यक्तित्व  »  परमहंस  »  श्री जगदीश चन्द्र जी 

 

 धर्मवीर, जागनी रतन, सरकार श्री जगदीश चन्द्र जी

 विक्रम सम्वत् १९८२ से २०५७

 

 

संक्षिप्त जीवन परिचय

सरकार श्री जगदीश चन्द्र जी का जीवन सभी सुन्दरसाथ के लिए एक अविस्मरणीय उदाहरण है कि किस प्रकार पूर्ण समर्पण व निष्काम सेवा से उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं ।

एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी श्री जगदीश चन्द्र जी बचपन से ही अध्यात्म व परब्रह्म के प्रति विशेष रूप से आकर्षित रहते थे । उनके माता-पिता पहले ही श्री निजानन्द सम्प्रदाय के अनुयायी थे । उनके जन्म स्थान हड़प्पा (पाकिस्तान) में उनके पैतृक निवास में श्री प्राणनाथ जी का मन्दिर विद्यमान था । अतः वहां अनेक साधू-महात्माओं का प्रायः आगमन होता ही रहता था । ऐसे वातावरण में उनका मन भी अध्यात्म के मूल प्रश्नों पर चिन्तन करने लगा ।

बालपन में ही उनको परमहंस महाराज श्री मेहर दास जी की संगति प्राप्त हुई । उनकी कृपा से सरकार श्री का चिन्तन और भी गहरा होता गया तथा उनके मन में आध्यात्म की दृढ़ नींव पड़ गई । परमहंस महाराज के आत्मिक प्रेम व प्रभावशाली व्यक्तित्व ने उनको बहुत आकर्षित किया । परमधाम की आत्माओं में प्रेम होना स्वाभाविक ही है । परन्तु उनके धामगमन के पश्चात् सरकार श्री ��ो जीवन की नश्वरता का बोध हुआ ।

अपनी युवावस्था के दौरान मिन्टगुमरी (पाकिस्तान) में सरकार श्री अनेक सामाजिक व राष्ट्रवादी संस्थाओं से जुड़ गये तथा उसमें सक्रिय भूमिका निभाई । ऐसी संगति के कारण उनका झुकाव रामायण तथा हनुमान जी के प्रति बढ़ गया । भारत-पाकिस्तान बँटवारे के बाद आपका परिवार इलाहाबाद में रहने लगा । वहीं पर आपने कठोर साधना करके हनुमान जी का साक्षात्कार किया । परन्तु फिर भी मन के संशय नहीं मिटे तथा चिर आनन्द पाने की तीव्र अभिलाषा बनी रही ।

कुछ समय पश्चात् सरकार श्री को परमहंस महाराज श्री राम रतन दास जी द्वारा स्थापित शेरपुर आश्रम में जाने का अवसर मिला । उस यात्रा ने उनका जीवन ही बदल दिया । मई की ज्वलनशील गर्मी में जब वे १५-१६ कि. मी. पैदल चलकर शेरपुर आश्रम पहुँचे, तो महाराज जी के अति प्रेममयी आत्मिक व्यवहार से उनकी सारी थकान मिट गयी । महाराज जी ने स्वयं उनका सामान ढोया तथा मिट्टी व पसीने से लथपथ उनके शरीर को गले से लगा लिया । अगले ही दिन महाराज जी ने सरकार श्री को श्री प्राणनाथ जी की महिमा का बोध कराकर तारतम दे दिया । सच्चे सदगुरु से मिलकर उनकी आत्मा को अपार हर्ष हुआ ।

परमहंस महाराज जी पर बहुत से सुन्दरसाथ ने अपना तन-मन समर्पित किया, परन्तु प्रमुख रूप से सरकार श्री का ही नाम आता है । जब सरकार श्री अपने सदगुरु महाराज की सेवा में समर्पित थे, उस समय भण्डारे के समय हर सुन्दरसाथ उनकी सेवा और अनुशासन व्यवस्था को देखकर दंग रह जाता था । सरकार श्री स्वयं फावड़ा व टोकरा उठाकर दिन-रात शेरपुर तक आने वाले कच्चे मार्ग को ठीक करने में लगे रहते थे । उन्हें अपने खाने-पीने की भी चिन्ता नहीं रहती थी । रात दिन सेवा में अथक परिश्रम करने के कारण परमहंस महाराज जी उन्हें अपना 'लोहे का घोड़ा' कहकर प्यार किया करते थे ।

अपनी सेवा और समर्पण भावना से सरकार श्री ने अपने सदगुरु का हृदय जीत लिया । एक बार परमहंस महाराज जी उन्हें कशमीर यात्रा पर ले गये । वहां उन्होंने कृपा करके सरकार श्री को परमधाम व अक्षरातीत युगल स्वरूप श्री राजश्यामा जी के दर्शन कराये ।

सौभाग्यवश एक सुअवसर पर सरकार श्री ने महाराज जी से उनके चरण कमलों का प्रेम मांग लिया । सदगुरु की कृपा से उन्होंने श्री प्राणनाथ जी की वाणी की ऐसी ज्योति जलाई कि उनका जीवन आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन गया है । अपने सदगुरु से ब्रह्मज्ञान का आशीष मिलने के पश्चात् उन्होंने ब्रह्मसृष्टियों की जागनी को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया । जागनी कार्य में विशिष्ट योगदान के कारण सुन्दरसाथ ने उन्हें 'जागनी रतन' , 'धर्मवीर' या 'सरकार' आदि सम्बोधनों से सुशोभित किया ।

अनेक वर्षों तक सरकार श्री ने आत्माओं तक ब्रह्मवाणी पहुँचाने की सेवा का बीड़ा अपने शरीर की परवाह किये बिना उठाया । कानपुर से सम्वत् २०२९ में शुरु हुआ यह अभियान उनके धामगमन तक निरन्तर चलता रहा । इस अवधि में उन्होंने गांव-गांव व शहर-शहर यात्रा करके सुन्दरसाथ को श्री प्राणनाथ जी की वाणी से जोड़ा । उत्तर प्रदेश, गुजरात, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश व अमेरिका के अनेक शहरों में उन्होंने वाणी की अलख जगाई जिसका केन्द्र मुज़फ्फरनगर स्थित रतनपुरी आश्रम बना ।

यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि छत्रसाल जी के अन्तर्धान के पश्चात् सरकार श्री ने ही इस वाणी को छपवाकर सामान्य सुन्दरसाथ के पठन-पाठन व चिन्तन-मनन के लिए उपलब्ध कराया । मध्यकाल में यह ब्रह्मज्ञान परमहंसों तक ही सीमित रहा ।

धर्मवीर जागनी रतन सरकार श्री जगदीश चन्द्र जी ने एक सशक्त ज्ञान और अनुशासन प्रिय समाज का निर्माण किया । श्री प्राणनाथ जी व अपने सदगुरु के प्रति उनका समर्पण तथा सुन्दरसाथ के प्रति उनका सेवा भाव अनुकरणीय है । उनकी कृपा से मिले ब्रह्मज्ञान के लिए आने वाले सभी सुन्दरसाथ को सदा उनका आभार प्रकट करना चाहिए ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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