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औरंगाबाद व रामनगर के प्रसंग

श्री प्राणनाथ जी ने उदयपुर में ही मुकुन्द दास व खिमाई भाई को औरंगाबाद के राजा भाव सिंह को जागृत करने के लिये भेज दिया । बहुत प्रयास करने के बाद दोनों सुन्दरसाथ राजा से भेंट कर सके । परन्तु राजा भाव सिंह के गुरु महन्त राम दास ने उनसे वैर साध लिया । अवसर पाकर महन्त ने मुकुन्द दास जी को एकांत में डण्डों से बहुत पीटा तथा नगर से बाहर छोड़ आये । क्या सच्चा ज्ञानी कभी भी ईर्ष्यावश ऐसा व्यवहार कर सकता है ?

मुकुन्द दास जी ने हार नहीं मानी । उन्होंने पुनः प्रयास किया और राजा भाव सिंह से मंदिर में भेंट की । राजा ने उन्हें आदरपूर्वक अपनी हवेली के पास ही ठहरा दिया । मुकुन्द दास जी ने वेदान्त व भागवत के २३ प्रश्न लिखकर राजा को दिये । इसी प्रकार दरबार के सभी विद्वानों व पण्डितों ने मिलकर ८० प्रश्न लिखकर उनको दिये । मुकुन्द दास जी ने उसी दिन सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया, किन्तु पण्डितों को उनके प्रश्न समझ में ही नहीं आये । भला श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञान के बिना अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को कैसे सुलझाया जा सकता है । अन्ततः शास्त्रार्थ में मुकुन्द दास जी की विजय के साथ ही राजा भाव सिंह ने श्री प्राणनाथ जी व सभी सुन्दरसाथ को सम्मानपूर्वक औरंगाबाद आमंत्रित किया ।

राजा भाव सिंह ने धाम धनी श्री प्राणनाथ जी के दर्शन पाकर अपने को धन्य समझा । अपनी हवेली में सबको पधराकर उसने उनकी बहुत सेवा की । जब उसे पता चला कि हिन्दू ग्रन्थों के साथ-साथ मुस्लिम ग्रन्थों में भी श्री प्राणनाथ जी को ख़ुदा (परब्रह्म) माना गया है, तो उसने श्री जी से अपने चार उच्चपदस्थ मुस्लिम अधिकारियों को प्रबोधित करने का निवेदन किया ।

वे चार अधिकारी थे- अव्वल खां, महीन खां, जहान मुहम्मद और फतह मुहम्मद । अव्वल खां तो उदयपुर में ही श्री प्राणनाथ जी की शरण में आ गया था । कुछ दिन चर्चा सुनकर महीन खां को भी ईमान आ गया तथा उसने तारतम ग्रहण कर लिया । जहान मुहम्मद को सम्पूर्ण क़ुरआन कण्ठस्थ थी । पढ़े-लिखे लोगों में उसकी ख्याति अरबी खां के नाम से थी । वह सभी पठानों को क़ुरआन की तालीम दिया करता था । एक दिन वह किसी बात पर सुन्दरसाथ से रुष्ट हो कर चला गया । श्री जी पहली दृष्टि में ही पहचान गये थे कि जहान मुहम्मद में परमधाम की आत्मा है । वह निश्चिन्त थे कि परमधाम की आत्मा अक्षरातीत की इस ब्रह्मवाणी का रस लेने के बाद कभी भी इससे दूर नहीं रह सकती । अगले दिन ही वह प्रयश्चित करता हुआ वापस आ गया ।

पठान फतह मुहम्मद संकीर्ण मानसिकता का व्यक्ति था और किसी हिन्दू के आगे शीश नमाना उसे स्वीकार नहीं था । उसने श्री प्राणनाथ जी का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया । उसने जहान मुहम्मद को भड़काया तथा ४० हदीसें देकर श्री जी से उनका अर्थ पुछवाया । श्री जी ने जहान मुहम्मद को तारतम ज्ञान दे दिया । तारतम पाकर उसकी आत्मिक दृष्टि खुल गयी । जहान मुहम्मद को उन ४० हदीसों के भेद स्पष्ट हो गये, अपने आत्मिक स्वरूप की पहचान हो गई तथा उसने श्री जी की कृपा से परमधाम में विराजमान अक्षरातीत परब्रह्म के दर्शन भी कर लिये ।

उस्ताद जहान मुहम्मद के श्री प्राणनाथ जी पर ईमान ले आने से खलबली मच गई । उसने फतह मुहम्मद को भी श्री जी के वास्तविक स्वरूप की पहचान कराने का प्रयास किया । फतह मुहम्मद ने भी स्वीकार कर लिया कि श्री प्राणनाथ जी ही आखरूल जमां इमाम महदी (ख़ुदा) के स्वरूप हैं, परन्तु वह तब तक ईमान नहीं ला सकता जब तक औरंगज़ेब बादशाह नहीं मान लेता । इस पर जहान मुहम्मद ने स्पष्ट कहा कि तुम्हारा ईमान तो बादशाह पर ही है, अल्लाह तआला पर नहीं ।

सब बातें जानने के पश्चात् राजा भाव सिंह ने औरंगज़ेब से लोहा लेना स्वीकार किया परन्तु वह परमधाम के दर्शन की हठ करने लगा । श्री जी जानते थे कि उसके अन्दर परमधाम का अंकुर नहीं है । बहुत समझाने पर भी जब वह नहीं माना तो श्री जी ने उसे योगमाया की झलक दिखाई । भावसिंह का जीव वहां के प्रेम, सुख और तेज को सहन नहीं कर सका तथा उसकी सुरता अक्षर धाम में ही अटक गई अर्थात् शरीर छूट गया ।

राजा भावसिंह के बाद दीवान फतह मुहम्मद ने राज्य पर नियन्त्रण कर लिया । उसने श्री जी व सभी सुन्दरसाथ को बन्दी बनाना चाहा परन्तु सभी बुरहानपुर चले गये । वहां से आकोट होते हुए सभी रामनगर आ गये ।

रामनगर का हिन्दू राजा औरंगज़ेब के भय से श्री जी व सुन्दरसाथ को आश्रय नहीं देना चाहता था । तभी औरंगज़ेब ने शेख खिज्र को सेना सहित श्री प्राणनाथ जी व वैरागी सुन्दरसाथ को पकड़ने के लिये भेज दिया । शेख खिज्र व उनके दीवान भिखारी दास ने जब श्री जी की चर्चा सुनी तो वे उनके चरणों में नतमस्तक हो गये तथा पूरी फौज सहित तारतम ग्रहण कर लिया । शेख खिज्र ने अपने प्रमुख पुरदल खां को यह लिख कर भेज दिया कि यह तो आखिरी ज़माने के खावंद हैं तथा रामनगर के राजा को भी फटकारा कि वह साक्षात् पूर्ण ब्रह्म सच्चिदानन्द को नहीं पहचान सका । तत्पश्चात् भिखारी दास व अन्य सैनिक जिन्हें श्री जी पर विशेष श्रृद्धा थी, अपने पूरे परिवार सहित सुन्दरसाथ में सम्मिलित हो गये ।

रामनगर के राजा ने औरंगज़ेब के भयवश तथा दरबारी पण्डितों के बहकावे में आकर श्री प्राणनाथ जी व सुन्दरसाथ को राज्य से चले जाने को कहा । श्री जी दुःखी मन से रामनगर से चले गये । फलस्वरूप वहां की भूमि बंजर व असार बन गई । अन्ततः श्री जी सभी सुन्दरसाथ सहित पद्मावती पुरी पन्ना पहुँचे ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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