Shri Prannath Gyanpeeth-     मासिक पत्रिका आर्थिक सेवा सम्पर्क करें
                                                                 




मुख्य संस्था अध्यात्म निजानन्द दर्शन विजयाभिनन्द बुद्ध ब्रह्मवाणी (तारतम) चितवनि महान व्यक्तित्व साहित्य प्रवचनमाला सुन्दरसाथ
  निजानन्द दर्शन
     प्रकृति की उत्पत्ति व लय 
     इस जगत में नहीं है परब्रह्म 
     ब्रह्म का स्वरूप कैसा है ? 
     तीन पुरुष और उनकी लीला » 
     जीव और आत्मा में भेद 
     तीन सृष्टियां 
     श्री निजानन्द सम्प्रदाय » 
     निजानन्द साहित्य 
     विश्व को निजानन्द दर्शन की देन 
 
 
 
 
 
 
 
  निजानन्द दर्शन  »  इस जगत में नहीं है परब्रह्म 

इस जगत में नहीं है परब्रह्म

श्री प्राणनाथ जी ने कहा है- 

उपज्या याको केहेवही , कहे प्रले होसी ए ।

ब्रह्म बतावें याही में , कहे ए सब माया के ।।   (कि. ७३/३)

संसार के ज्ञानी जन जिस जगत को उत्पन्न हुआ कहते हैं , उसको प्रलय में काल के गाल में समाने वाला भी कहते हैं । पुनः यह भी कहते हैं कि इस जगत के कण-कण में ब्रह्म विराजमान हैं । पुनः यह भी सुना देते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत मायामयी है । क्या रात्रि के अन्धकार के कण-कण में सूर्य विद्यमान हो सकता है ।

सत सुपने में क्यों कर आवे , सत सांई है न्यारा । ( कि. ३२/२ )

सत्य स्वरूप ब्रह्म इस स्वप्नवत् मिथ्या जगत में कैसे आ सकता है । वह तो इस नश्वर जगत से सर्वथा परे ही है ।

सम्पूर्ण अध्यात्म जगत परब्रह्म को सर्वज्ञ और अखण्ड मानता है और यह वास्तविकता भी है , किन्तु सर्वज्ञ और अखण्ड सिद्ध करने के लिए परब्रह्म को इस सृष्टि के कण-कण में व्यापक तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म मानना पड़ेगा । यहीं से निराकारवाद का सिद्धान्त लागू हो ���ाता है ।

इस मायावी सृष्टि के कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म के सर्व व्यापक मानने पर ये प्रश्न उपस्थित होते हैं-

  • यह सम्पूर्ण जड़ जगत चेतन , अखण्ड और अविनाशी होना चाहिए ।

  • इस जगत के कण-कण से लौह अग्निवत् ब्रह्मरूपता की झलक मिलनी चाहिए ।

  • प्रत्येक प्राणी पूर्ण ज्ञानवान होना चाहिए । न तो धर्मशास्त्रों की आवश्यकता होनी चाहिए और न पढ़ने पढ़ाने की ।

  • प्रत्येक प्राणी तथा प्रत्येक कण आनन्द से परिपूर्ण होना चाहिए , जबकि व्यवहार में तो यही दिखता है कि प्रत्येक प्राणी किसी न किसी रूप में दुखी है ।

  • स्वर्ग , वैकुण्ठ तथा नरक में किसी भी प्रकार का अन्तर नहीं होना चाहिए , क्योंकि ब्रह्म अखण्ड और एकरस है ।

  • किसी भी प्राणी के अन्दर काम , क्रोध , लोभ , मोह तथा अहंकार आदि दुर्गुण नहीं होने चाहिए ।

  • इस संसार में जन्म तथा मृत्यु का चक्र नहीं चलना चाहिए ।

  • मल-मूत्र आदि से भी हमें घृणा के स्थान पर ब्रह्मरूपता की अनुभूति होनी चाहिए ।

  • भक्ति और मुक्ति जैसे शब्दों की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए ।

  • ब्रह्मरूपता वाली सृष्टि में जगत की उत्पत्ति एवं प्रलय की बात मात्र काल्पनिक होनी चाहिए ।

जिस प्रकार अन्धेरे के कण-कण में सूर्य व्यापक नहीं हो सकता , उसी प्रकार इस मायावी जगत के कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म का वह अखण्ड प्रकाशमान (नूरमयी) स्वरूप व्यापक नहीं हो सकता । इस जगत के कण-कण में उसकी सत्ता अवश्य है , किन्तु स्वरूप नहीं ।

श्री प्राणनाथ जी का कथन है-

हद पार बेहद है , बेहद पार अछर ।

अछर पार वतन है , जागिए इन घर ।। (प्र. हि. ३१/१६५)

इस हद के ब्रह्माण्ड से परे बेहद का मण्डल है । इसके अन्तर्गत अक्षर ब्रह्म के चारों पाद सत्स्वरूप , केवल , सबलिक और अव्याकृत हैं । मूल तत्व सच्चिदानन्द पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत हैं , जो अक्षर से भी परे हैं ।

परब्रह्म सर्वव्यापक अवश्य है किन्तु अपने निजधाम में , जहाँ के कण-कण में अनन्त सूर्यों का प्रकाश है , जहाँ अनन्त आनन्द है (ऋग्वेद ९/११३/७) । गीता में भी कहा गया है कि उस ब्रह्मधाम में न तो सूर्य प्रकाशित होता है न चन्द्रमा और न अग्नि ही । जहाँ जाने पर पुनः लौटना नहीं पड़ता वह मेरा परमधाम है ।

प्रकृति के अन्धकार से सर्वथा परे सूर्य के समान प्रकाशमान स्वरूप वाले परमात्मा को मै जानता हूँ , जिसको जाने बिना मृत्यु से छुटकारा पाने का अन्य कोई भी उपाय नहीं है (यजुर्वेद ३१/१८) । इसी प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों का भी कथन है कि हे परब्रह्म ! मुझे इस असत्य (जगत) से सत्य (अपने अखण्ड स्वरूप) की ओर ले चलो । तमस् (प्रकृति के अन्धकार) से प्रकाश (निजधाम) की ओर ले चलो । मृत्यु (लौकिक जगत) से मुझे अमरत्व (ब्रह्मधाम) में ले चलो (शतपथ ब्राह्मण १४/३/१/३०) ।

यदि सच्चिदानन्द परब्रह्म का स्वरूप इस नश्वर जगत के कण-कण में व्यापक होता तो वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों का कथन इस प्रकार नहीं होता । ब्रह्म इस सृष्टि का निमित्त कारण है , प्रकृति उपादान कारण है । जिस प्रकार निमित्त कारण कुम्भकार उपादान कारण मिट्टी से बने हुए घड़े के कण में नहीं बैठा होता , बल्कि घड़े के कण-कण से उसकी कारीगरी दिखती है , उसी प्रकार निमित्त कारण ब्रह्म इस सृष्टि के कण-कण में निज स्वरूप से नहीं है बल्कि इस जगत के कण-कण में उसकी सत्ता समायी हुई है ।

उपनिषद में स्पष्ट रूप कहा गया है कि अमृतस्वरूप दिव्य ब्रह्मपुर में परब्रह्म स्थित है ( मुण्डकोपनिषद् २/२/७ ) । प्रकृति से परे उस अविनाशी योगमाया के ब्रह्माण्ड में आगे-पीछे , ऊपर-नीचे , सर्वत्र कण-कण में अक्षर ब्रह्म का नूरमयी स्वरूप है । इसी प्रकार परमधाम में अनादि अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप कण-कण में है । ( मुण्डकोपनिषद् २/११/४३ )

वेद के कथनानुसार- यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म के चौथे पाद (अव्याकृत) द्वारा बना है । इसके तीनों पाद चेतन , प्रकाशमय और अखण्ड हैं । परब्रह्म का स्वरूप इन तीनो पादों से भी परे उस स्थान पर है , जिसे परमधाम ( दिव्य ब्रह्मपुर ) कहते हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा