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  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  कलियुग में प्रकटन  »  श्री इन्द्रावती जी की लीला  »  विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में शोभा

श्री विज���ाभिनन्द बुद्ध के रूप में सुशोभित

दिल्ली से चलकर विक्रम सम्वत् १७३५ में श्री प्राणनाथ जी हरिद्वार के महाकुम्भ में सम्मिलित हुए । हरिद्वार में वैष्णवों के चारों सम्प्रदाय, दश नाम सन्यास मत तथा षट् दर्शनों के आचार्यों के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ ।

चारों वैष्णव सम्प्रदायों के आचार्यों ने अपने-अपने मत का प्रतिपादन किया । सभी ने अपना इष्ट- लक्ष्मी तथा रुक्मणि आदि को बताया । मुक्ति का स्थान वैकुण्ठ, द्वारिका, आदि कहा । उन्होंने अपना परमात्मा विष्णु भगवान को ही ठहराया ।

श्री प्राणनाथ जी ने कहा कि वेदादि सभी ग्रन्थों के अनुसार महाप्रलय में १४ लोकों सहित सम्पूर्ण प्रकृति मण्डल का विनाश हो जाता है, तो आपके परमात्मा तथा मुक्ति का स्थान कहां सुरक्षित रहेगा ? आपका सारा ज्ञान तो प्रकृति के अन्दर का है । श्री जी के इस प्रश्न का किसी के पास उत्तर नहीं था ।

इसके पश्चात् दस नाम सन्यास मत के आचार्य शास्त्रार्थ के लिए प्रस्तुत हुए । उन्होंने अपनी सातों मन्याओं तथा चारों मठों का परिचय दिया । उनके मतानुसार भी ब्रह्म का धाम तथा जीव का मुक्तिस्थान प्रकृति के अन्दर ही सीमित है । केवल छठी मन्या में ही अखण्ड धाम की तरफ संकेत है, किन्तु उसका पूर्ण स्पष्टीकरण नहीं है ।

श्री जी ने जब प्रकृति से परे उस अखण्ड त्रिगुणातीत धाम के बारे में जानना चाहा, तो सभी सन्यासी मौन हो गये ।

शास्त्रार्थ का दृश्य बहुत रोमांचक था । हजारों की संख्या में लोग शास्त्रार्थ का आनन्द लेने के लिए श्रोता के रूप में उपस्थित थे । श्री प्राणनाथ जी जब भी ब्रह्म के अखण्ड धाम, स्वरूप तथा लीला के सम्बन्ध में प्रश्न करते तो आचार्यों को मौन होना पड़ता । सारी जनता आश्चर्यचकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी । अन्त में छः दर्शनों के आचार्य श्री जी से शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार हुए ।

सर्वप्रथम न्याय दर्शन के आचार्यों ने कहा- "जीव, ईश्वर तथा माया तीनों ही एक दूसरे से भिन्न तथा अनादि हैं । जब दुःख की २१ सीढ़ियों का नाश हो जाता है, तो जीव अखण्ड मुक्ति को प्राप्त होता है ।" श्री जी ने पूछा कि दुःख की २१ सीढ़ियों से परे ब्रह्म का अखण्ड स्वरूप कहां है ? इस प्रश्न का अनके पास कोई उत्तर नहीं था ।

मीमांसा दर्शन के आचार्यों ने कर्म को ब्रह्म का स्वरूप बताया । श्री जी ने कहा कि कर्म की उत्पत्ति जीव के मन, अहंकार तथा इन्द्रियों के संयोग से होती है । ब्रह्म तो इन सब प्रकृतिक तत्वों से रहित हैं, इसलिए उसे कर्म का स्वरूप नहीं कह सकते । निदान वे भी चुप हो गये ।

सांख्य शास्त्र के आचार्यों ने पुरुष एवं प्रकृति को नित्य व अनादि बताया और दोनों के मिलने से सृष्टि की उत्पत्ति बतायी । श्री जी ने पूछा कि इन दोनों का स्वरूप क्या है और ये कहां व कैसे मिलते हैं ? तारतम ज्ञान से रहित होने के कारण इन प्रश्नों का उनके पास कोई भी उत्तर नहीं था ।

वैशेषिक दर्शन के आचार्यों ने कहा कि सारे जगत की उत्पत्ति और लय का मूल काल है । काल ही ब्रह्म का स्वरूप है । श्री प्राणनाथ जी ने कहा कि जहां पर ब्रह्म का अखण्ड स्वरूप है, वहां पर काल की सत्ता नहीं होती, जबकि यह सम्पूर्ण जगत काल के अधीन है । कणाद मुनि ने कहीं भी जड़ तत्व काल को ब्रह्म का स्वरूप नहीं माना है ।

योग दर्शन के आचार्यों ने कहा कि ब्रह्म ज्योति स्वरूप है और इस सृष्टि के कण-कण में व्यापक है । योग के आठ अंगों के अनुष्ठान से इसी शरीर में ब्रह्म का साक्षात्कार होता है । श्री जी ने कहा कि ब्रह्म सत्, चिद् और आनन्द का स्वरूप है, तथा जगत असत्य, जड़ और दुःख का रूप है । ब्रह्म का अखण्ड स्वरूप इस मायावी जगत से परे है । वेद, उपनिषद में भी मात्र परमगुहा एकादश द्वार में ब्रह्म के साक्षात्कार का वर्णन है जो इस शरीर से परे है, जबकि योग दर्शन में परमगुहा का कोई वर्णन ही नहीं है ।

अन्ततोगत्वा वेदान्त के विद्वान बोले कि सब कुछ ब्रह्म का ही स्वरूप है । ब्रह्म के अन्दर माया है तथा माया के अन्दर ब्रह्म व्यापक है । श्री प्राणनाथ जी ने कहा कि यदि सब कुछ ब्रह्म का ही स्वरूप है, तो किसी को भी अज्ञानी नहीं होना चाहिए । वेद-शास्त्रों के ज्ञान की भी कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए । जिस प्रकार अन्धकार में सूर्य नहीं समा सकता, उसी तरह इस नश्वर जगत में ब्रह्म नहीं समा सकता ।

इस प्रकार सभी आचार्यों ने अपनी हार स्वीकार कर ली । तब श्री प्राणनाथ जी ने धर्मग्रन्थों से यह सिद्ध किया कि कलियुग में ब्रह्मात्माओं के साथ जिन अक्षरातीत परब्रह्म स्वरूप श्री विजयाभिनन्द निष्कलंक बुद्ध के आने का वर्णन है, वही वह हैं । फिर श्री जी ने सबको निजानन्द सम्प्रदाय की पद्धति सुनाई ।

उसी रात्रि को एक विशेष घटना भी हुई । रात्रि में धूम्रकेतु तारा प्रकट हुआ तथा उस वर्ष में एक मास की कमी रही । धर्मग्रन्थों में श्री विजयाभिनन्द बुद्ध के प्रकट होने के सम्बन्ध में ये दो निशान लिखे गये हैं ।

इन दोनों निशानों के प्रकट होने पर सभी आचार्यों ने श्री प्राणनाथ जी को 'श्री विजयाभिनन्द निष्कलंक बुद्ध' स्वरूप मानकर उनकी आरती उतारी, उनके नाम की ध्वजा फहराई तथा 'बुद्ध जी का शाका' भी प्रचलित किया ।

(हरिद्वार का शास्त्रार्थ में विस्तृत वर्णन पढ़ें)

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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