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विश्व को निजानन्द दर्शन की देन

वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, आदि अनेकों मत हैं और सबके धर्मग्रन्थ अलग-अलग हैं । इनके अनुयायियों की भाषा और वेशभूषा भी प्रायः अलग-अलग है । ऐसी परिस्थितियों में मानव-मानव के बीच ईर्ष्या, द्वैष तथा वैमनस्य की खाई होना स्वाभाविक ही है । श्री प्राणनाथ जी की वाणी ने संसार को ऐसा आध्यात्मिक दर्शन दिया है, जिसकी छत्रछाया में संसार के सभी मत परस्पर प्रेमपूर्वक रह सकते हैं । आवश्यकता है केवल इस अलौकिक ज्ञान के प्रसार की ।

इसी प्रकार हिन्दू धर्म के अन्दर भी १००० मतों में वैचारिक भिन्नता के कारण परस्पर सौहार्द का वातावरण नहीं है । सभी सम्प्रदायों की आपसी खैंचा-खैंच को दूर करने के लिए प्राणनाथ जी के अलौकिक तारतम्य ज्ञान की आवश्यकता है, जिसके उज्जवल प्रकाश में पौराणिक, सनातनी, जैन, बौद्ध, शाक्त, आदि मत यथार्थ सत्य की प्राप्ति कर सकते हैं । आवश्यकता है केवल निष्पक्ष हृदय से सत्य को ग्रहण करने की प्रवृत्ति की ।

संसार में प्रायः सभी मतों के अनुयायी यही चाहते ह���ं कि केवल उनका ही मत फैले । इसी संकुचित विचारधारा ने जब भी उग्र रूप लिया, तो करोड़ों निरीह मनुष्यों को प्राणों से हाथ धोना पड़ा है । प्रेम की शिक्षा देने वाले धर्म की ओट में ही यह खूनी खेल खेला गया है । निजानन्द दर्शन में वह शक्ति है, जो संसार के सभी मतों का एकीकरण करके सबको एक सत्य मार्ग का अनुयायी बनाकर शान्ति का साम्राज्य स्थापित कर सकता है ।

"मै कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ? परब्रह्म का धाम, स्वरूप तथा लीला क्या है? जगत महाप्रलय में कहाँ चला जाता है?" ये अध्यात्म जगत के मूल प्रश्न हैं जिनका यथार्थ उत्तर खोजने में संसार के मनीषी लगे रहे हैं, परन्तु यह निश्चित है कि तारतम्य ज्ञान के प्रकाश से रहित होकर इन प्रश्नों का समाधान कोई भी व्यक्ति नहीं कर सकता है, भले ही वह संसार में ज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर क्यों न स्थित हो ।

यद्यपि संसार के सभी अध्यात्मवादी यह बात मुक्त कण्ठ से स्वीकार करते हैं कि असंख्य ब्रह्माण्डों का स्वामी एक ही परब्रह्म (परमात्मा) है और उसकी प्राप्ति भी चेतना के शुद्ध धरातल पर ही हो सकती है । फिर भी परब्रह्म की उपासना के लिए शरीर, मन, वाणी, बुद्धि, आदि के आधार पर सैंकड़ों उपासना पद्धतियां प्रचलित हैं, जो प्रकृति से परे उस परब्रह्म का साक्षात्कार कराने में असमर्थ हैं । श्री प्राणनाथ जी की वाणी के अनुसरण से परब्रह्म के साक्षात्कार का वह मार्ग प्रशस्त हो जाता है, जो वेदादि सभी आर्ष ग्रन्थों का परम ध्येय रहा है ।

संसार के सभी धर्मग्रन्थों में अध्यात्म के गहन रहस्य छिपे पड़े हैं, किन्तु आज का मानव उन रहस्यों से अनजान है । अथर्ववेद के अन्दर कई ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर मानवीय बुद्धि नहीं दे सकती । परब्रह्म की कृपा एवं तारतम्य ज्ञान के आलोक में ही उन प्रश्नों का समाधान निहित है । इसी प्रकार क़ुरआन के 'हरुफे मुक्तेआत' भी हैं, जिनका उत्तर खोजने के लिए हमें श्री प्राणनाथ जी की वाणी की शरण लेनी ही पड़ेगी ।

यदि संसार के लोग निजानन्द दर्शन के शाश्वत सत्य को अंगीकार कर लें, तो यह निश्चित है कि संकीर्ण विचारधाराओं के कारण उत्पन्न होने वाली वर्गवाद, क्षेत्रवाद, व्यक्तिवाद तथा उग्रवाद की आंधी पूर्णतया शान्त हो जाएगी तथा उसकी जगह प्रेम, शान्ति एवं सौहार्द की शीतल, मन्द एवं सुगन्धित वायु बहने लगेगी, जिसके आनन्द में संसार का प्रत्येक प्राणी विभोर हो जाएगा ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा