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अध्यात्म के मूल प्रश्न

अध्यात्म की राह पर चलने वाले व्यक्ति को इस प्रकार की जिज्ञासाओं से होकर गुजरना पड़ता है कि इस सृष्टि का मूल कारण क्या है? परब्रह्म कहाँ है? उनका स्वरूप तथा लीला क्या है? मै कौन हूँ? मृत्यु के बाद मै कहाँ जाऊँगा अर्थात् मेरा असली घर कहाँ है? मुझे वास्तविक शान्ति कैसे प्राप्त हो?

तारतम्य ज्ञान की दृष्टि में इन दार्शनिक प्रश्नों का समाधान संक्षेप में इस प्रकार है-

यह कैसा संसार है जिसमें मै लाखो जन्मों से भटक रहा हूँ ? यह सम्पूर्ण जड़ जगत प्रकृति में होने वाली विकृति से बना है। इसका निमित्त कारण ब्रह्म है और उपादान कारण प्रकृति। पंचभूतों के द्वारा प्रगट होने वाले ५ विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, बन्ध) के भोग की तृष्णा में प्राणी ८४ लाख योनियों में भटकता रहता है। जब तक चैतन्य (जीव) में प्रकृति के सुखों के भोग की वासना रहेगी, तब तक वह इसे पार करके न तो ब्रह्म साक्षात्कार ही कर पाएगा और न अखण्ड मुक्ति का सुख प्राप्त कर पाएगा ।

मेरा असली स्वरूप क्या है ? अपने मूल स्वरूप में जीव शुद्ध और निर्विकार है, किन्तु इस प्राकृतिक जगत में शरीर ��न्धन के द्वारा ही उसे विषयों में भटकना पड़ता है। उसे अपनी पूर्ण शुद्ध अवस्था प्राप्त करने के लिए परब्रह्म की उपासना रूप सम्यक् समाधि द्वारा पंचकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय) या तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) से परे होना पड़ेगा । स्थूल शरीर में ५ स्थूल भूत + १० इन्द्रिय + ५ तन्मात्रा + ४ अन्तःकरण होते हैं। सूक्ष्म शरीर में १० इन्द्रिय + ५ तन्मात्रा + ४ अन्तःकरण होते हैं। कारण शरीर में केवल चार अन्तःकरण चैतन्य के साथ जुड़े होते हैं ।

महाकारण स्वरूप में चैतन्य के साथ प्रकृति का सम्बन्ध समाप्त होने लगता है और वह परब्रह्म की कृपा से प्राप्त समाधि द्वारा लौह-अग्निवत् ब्रह्म के साधर्म्य को प्राप्त कर लेता है। उसके इस शुद्ध स्वरूप को हंस कहते हैं। बेहद में रहने वाली ईश्वरी सृष्टि तथा परमधाम में रहने वाली ब्रह्मसृष्टि का मायायिक बन्धन नहीं होता, वह ब्रह्मबोध तथा अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति के सहारे अपने निज घर को प्राप्त कर लेती हैं ।

मै कौन हूँ ? तीनो स़ष्टियों में से या तो मै जीव सृष्टि हूँ या ईश्वरी सृष्टि या ब्रह्मसृष्टि। अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति तथा ब्रह्मज्ञान (तारतम) द्वारा ब्रह्मसृष्टि परमधाम और ईश्वरीसृष्टि बेहद (अक्षरधाम) में चली जाएगी तथा जीवसृष्टि भी बैकुण्ठ निराकार से परे बेहद में अखण्ड मुक्ति प्राप्त कर लेगी ।

परब्रह्म कहाँ हैं ? क्षर पुरुष का स्वरूप मोह सागर से प्रगट हुआ है। अक्षरब्रह्म की लीला बेहद (अक्षरधाम) में होती है तथा इन सबसे परे सच्चिदानन्द परब्रह्म का स्वरूप परमधाम के कण-कण में विराजमान है। इस नश्वर जगत के कण-कण में ब्रह्म नहीं, उनकी सत्ता मात्र है। संक्षेप में कालमाया के इस ब्रह्माण्ड से परे योगमाया है, जिसके परे परमधाम है।

परब्रह्म का स्वरूप कैसा है ? साकार स्वरूप या तो देवी-देवताओं और महापुरुषों का है, या कार्य रूप स्थूल जड़ जगत का । निराकार स्वरूप कारण रूप जड़ प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, आकाश और वायु का है । सच्चिदानन्द परब्रह्म का स्वरूप साकार और निराकार से परे शुद्ध स्वरूप और त्रिगुणातीत है, जिसे वेद में भर्गः , आदित्यवर्ण आदि तथा कुरआन पक्ष में नूर शब्द से सम्बोधित किया गया है ।

परब्रह्म की लीला कैसी है ? प्रेम के अन्दर ही आनन्द का स्वरूप विराजमान होता है । अतः सच्चिदानन्द अक्षरातीत परब्रह्म की लीला प्रेममयी और आनन्दमयी है । वह इस जगत के सुख और दुख की लीला नहीं करते हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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