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श्री पन्ना जी की बीतक

श्री पद्मावती पुरी (पन्ना जी) पहुँचने तक पांच हजार सुन्दरसाथ अपना गृह त्याग कर श्री प्राणनाथ जी के चरणों में समर्पित हो चुके थे । सभी सुन्दरसाथ के साथ श्री जी पन्ना पहुँचे । उस समय महाराज छत्रसाल जी मऊ सहानिया में थे । अफ़गन खां के आक्रमण के कारण छत्रसाल जी ने श्री जी से आग्रह किया कि वे स्वयं कुछ सुन्दरसाथ के साथ मऊ पधारें । श्री जी से छत्रसाल जी की प्रथम भेंट वहीं हुई । प्रथम दृष्टि में ही श्री जी पहचान गए कि छत्रसाल के अन्दर परमधाम की विशेष आत्मा है । तत्पश्चात् श्री जी की कृपा से शेर अफ़गन खां की विशाल सेना के विरूद्ध असम्भव दिखने वाली विजय सरलता से छत्रसाल जी को प्राप्त हो गई ।

अन्दर जाए के ए कही , जिन्हें करना होए दीदार ।

सो सबहीं कीजियो , आया परवरदिगार ।। (श्री बीतक साहब ६०/२७)

साथ समस्त के बीच में , जुगल धनी बैठाए ।

कही तुम साक्षात अक्षरातीत हो , हम चीन्हा तुमें बनाए ।। (श्री बीतक साहब ६०/५७)

छत्रसाल जी ने अपनी तीनों रानियों के साथ श्री प्राणनाथ जी की पालकी को कंधे पर उठाकर अपने महल में पधराया । उन्होंने चौपड़े की हवेली में श्री जी व बाई जी को बिठाकर साक्षात् पूर्णब्रह्म अक्षरातीत युगल स्वरूप मानकर उनकी आरती उतारी और सबके सामने यह घोषणा कर दी कि जो भी इन्हें अक्षरातीत मानने में संशय करता है, वह परमधाम की ब्रह्मसृष्टि ही नहीं है । छत्रसाल जी ने सच्चे हृदय से अपना जीव, तन, मन, धन उन पर न्यौछावर कर दिया । छत्रसाल जी की ऐसी निष्ठा देखकर श्री प्राणनाथ जी ने उन्हें हुक्म की शक्ति दे दी तथा स्वयं माथे पर तिलक लगाकर महाराजा घोषित कर दिया । जिस प्रकार राम ने बाली से युद्ध करने से पहले सुग्रीव को तथा रावण से युद्ध करने से पहले ही विभीषण को राजा घोषित कर दिया था, उसी प्रकार श्री जी की कृपा से छत्रसाल जी के शासनकाल में बुन्देलखण्ड पर कोई भी विजय प्राप्त नहीं कर सका ।

महाराजा छत्रसाल जी के चाचा बलदीवान सहित कुछ लोगों के मन में श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप के सम्बन्ध में संशय था, जिसे दूर करने के लिये क़ुरआन और वेद-शास्त्रों के विद्वान बुलाये गये ।

तीन सुप्रसिद्ध विद्वान सुन्दरदास, वल्लभदास व बद्रीदास को श्री जी से शास्त्रार्थ के लिये बुलाया गया । आपसी सहमति से बद्रीदास को श्रेष्ठ मानते हुये उनसे शास्त्रार्थ तय हुआ । जब उनसे श्री कृष्ण का त्रिधा लीला तथा परब्रह्म के धाम, स्वरूप व लीला के सम्बन्ध में पूछा गया तो वह उत्तर न दे सका । तत्पश्चात् उसने यह स्वीकार किया कि इन प्रश्नों का उत्तर यथार्थ रूप से परमात्मा ही जानते हैं तथा श्री प्राणनाथ जी ही कलियुग में प्रकट होने वाले 'विजयाभिनन्द बुद्ध' के स्वरूप हैं ।

महोबा के विश्व प्रसिद्ध काज़ी अब्दुल रसूल से श्री जी की क़ुरआन पर चर्चा हुई । पांच तरह की पैदाइश के प्रश्न पर काज़ी ने हार मानकर श्री प्राणनाथ जी के चरणों में प्रणाम किया और क़ुरआन सिर पर रखकर कसम खाते हुये कहा कि श्री प्राणनाथ जी ही क़ियामत के समय में आने वाले आखरूल ज़मां इमाम महदी (ख़ुदा) हैं । इस घटना के बाद सभी दरबारियों को श्री जी पर निष्ठा जागृत हो गई ।

इसी प्रकार काशी के अद्वितीय विद्वान भट्टाचार्य जी ज्ञान के अहं में स्वयं को अवतारी पुरुष मानने लगे थे । परन्तु उनकी पत्नी ने उनकी आरती उतारने से यह कहकर मना कर दिया कि पहले आप श्री प्राणनाथ जी से जीतकर आइये । वे तुरन्त ग्रन्थों से भरी बैलगाड़ी लेकर पन्ना के लिये चल पड़े । श्री जी ने सब कुछ समझकर कुछ सात-आठ वर्ष की कन्याओं के सिर पर हाथ रख दिया । भट्टाचार्य जी के आगमन के समय वे कन्यायें खेलते हुये ब्रह्मवाणी की कुछ चौपाइयां गाने लगीं जिसका भाव था- मैं उस समय की बात कहता हूँ जब न आदि नारायण (ईश्वर) थे और न मूल प्रकृति थी । उस समय केवल अक्षर व अक्षरातीत थे । भट्टाचार्य जी का सारा ज्ञान तो नारायण और प्रकृति तक ही सीमित था । अतः सब कुछ समझकर उन्होंने श्री प्राणनाथ जी के चरणों में शीश नमाया ।

श्री छत्रसाल जी सभी सुन्दरसाथ की सेवा का भार अपने ऊपर लेना चाहते थे, किन्तु उनका राज्य सीमित था और धन का अभाव था । श्री प्राणनाथ जी ने उन्हें यह आशीर्वाद दिया कि आज प्रातः से सायं तक अपने घोड़े से राज्य के जितने भाग में दौड़ लगा लोगे, वहां तक की धरती हीरा उगलने लगेगी । इस अलौकिक घटना का चमत्कार आज भी श्री पन्ना जी में दिखाई देता है ।

छत्रसाल जी फिर भी संतुष्ट नहीं हुये क्योंकि वे स्वयं कुछ करना चाहते थे । अतः उन्होंने राज्य विस्तार की योजना बनाई । श्री प्राणनाथ जी को सम्मानपूर्वक साथ लेकर स्वयं सेनापति बनकर उन्होंने राठ, खड़ोत, जलालपुर, कालपी, आदि राज्यों पर चढ़ाई कर दी । सभी मुस्लिम राज्यों में काज़ियों तथा मुल्लाओं को एकत्रित करके उनकी श्री जी से क़ुरआन-हदीसों पर वार्ता करवायी गई । सभी ने हार मानते हुये लिखकर दे दिया कि श्री प्राणनाथ जी ही आखरूल इमाम मुहम्मद महदी (ख़ुदा) हैं । कालपी के मौलवियों द्वारा लिखा हुआ पत्र जब औरंगज़ेब के पास पहुँचा तो वह शर्मिंदा हो गया ।

जब से दिल्ली में श्री प्राणनाथ जी का संदेश लेकर गये सुन्दरसाथ को यातना दी गयी, तभी से मुगल शासन का पतन प्रारम्भ हो गया । दिन-प्रतिदिन उनकी सेना व धनकोष में कमी होती गई । औरंगज़ेब ने बुन्देलखण्ड (छत्रसाल जी का राज्य) पर सबसे अधिक आक्रमण किया, परन्तु छत्रसाल जी के सामने उसकी सेना व सेनापतियों की वही दुर्दशा होती थी जो अग्नि के समक्ष सूखी घास की होती है । यह श्री प्राणनाथ जी की कृपा का ही फल था कि सभी २५२ युद्धों, जिसमें ५२ प्रमुख थे, में छत्रसाल जी ने विजय प्राप्त की ।

छत्रसाल जी राजकीय कार्यों का साथ-साथ आध्यात्मिक क्षेत्र पर भी पूरा ध्यान देते थे । लगभग दस वर्षों तक श्री प्राणनाथ जी की कृपा से पन्ना जी में परमधाम का आनन्द बरसता रहा । सबने यही माना कि हमारे मध्य परब्रह्म की लीला चल रही है । सभी सुन्दरसाथ रात-दिन अलौकिक ब्रह्मज्ञान की चर्चा व चितवनि के रस में डूबे रहते थे । सम्वत् १७४८ तक लगभग पूरी वाणी का अवतरण हो चुका था । इसके पश्चात् तीन वर्षों तक श्री महामति जी गुम्मट जी में चितवनि की गहन अवस्था में लीन रहीं । यह सभी सुन्दरसाथ के लिए एक सिखापन है कि जब महामति जी अक्षरातीत की शोभा को प्राप्त करके भी मूल युगल स्वरूप की चितवनि कर सकती हैं, तो हम सुन्दरसाथ का तो विशेष कर्त्तव्य बनता है कि हम प्रतिदिन चितवनि का लाभ लें ।

अन्ततः सम्वत् १७५१ में श्री महामति जी ने लौकिक लीला को विराम देते हुए अखण्ड ध्यानावस्था धारण कर ली । उनके ध्यानलीन होते ही लगभग ५०० सुन्दरसाथ ने उनके विरह में तन त्याग दिया । इतिहास में कभी भी ऐसी घटना नहीं हुई कि जिसमें इतने लोगों ने एक साथ बिना किसी शारीरिक कष्ट के अपने शरीर का त्याग किया हो । धन्य हे वे सुन्दरसाथ ! उन सभी सुन्दरसाथ की आत्मा श्री प्राणनाथ जी में लीन हो गई । आज भी श्री प्राणनाथ जी पन्ना जी के गुम्मट मंदिर में विराजमान हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से इस जागनी लीला का सम्पादन कर रहे हैं ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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