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क़ियामत का ज़ाहिर होना

रसूल मुहम्मद (सल्ल.) के समय परमधाम की रूहें (ब्रह्मसृष्टियाँ) इस खेल में नहीं आयी थीं इसलिए ख़ुदा ने उनसे वादा किया कि फरदारोज़ (कल के दिन) अर्थात् गयारहवीं सदी में क़ियामत होगी औ�� मै उस समय आऊँगा ।

क़ुरआन में लिखा है कि १०९० हिज़री बीतने पर क़ियामत आयेगी (क़ुरआन २२/३४/३० तथा २८/५९ में यह वृत्तान्त संकेतों में वर्णित है) । अब तक क़ुरआन के बड़े-बड़े विद्वान हो चुके हैं लेकिन किसी ने भी इसका भेद आज तक नहीं खोला है ।

प्रायः क़ियामत शब्द सुनते ही सामान्य मुस्लिम जन घबरा जाते हैं । वे सोचते हैं कि महाप्रलय की घड़ी आने वाली है । यह उनकी बहुत बड़ी भूल है । महाप्रलय की घड़ी को 'हश्र का दिन' कहते हैं, जो सातवें दिन योगमाया के ब्रह्माण्ड में होनी है । क़ियामत आने की घटना तो पाँचवें दिन की लीला है । यह तो सारी दुनिया के लिए खुशी का पैगाम है, क्योंकि क़ियामत के समय पूर्ण ब्रह्म अल्लाह तआला इस नश्वर जगत में आये हैं । उनके साथ अर्श-ए-अज़ीम (परमधाम) का वह अलौकिक ज्ञान इल्म-ए-लद्दुनी (श्री कुल्जम स्वरूप) आया है, जिससे एक परब्रह्म की पहचान करके सभी प्राणी भवसागर से पार हो जायेंगे ।

जो लो ले ऊपर के माएने , तोलो कबूं न बूझा जाए ।

सक छोड़ न होवे साफ दिल , जो पढ़े सौ साल ऊपर जुबांए ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप- मा. सा. ११/३४)

जब तक क़ुरआन के ज़ाहिरी अर्थ लेंगे, तब तक वास्तविक रहस्य समझ में नहीं आयेगा । श्री प्राणनाथ जी के इल्म से रहित कोई व्यक्ति यदि सौ साल तक भी क़ुरआन पढ़ता रहे, तो भी न तो उसके संशय मिट सकेंगे और न उसका दिल ही निर्मल हो सकेगा ।

क़ियामत के जो सात निशान क़ुरआन में बताये गये हैं, उसके बातूनी भेद न समझने के प्रायः मुस्लिम जनों को अभी यह विश्वास नहीं हो सका है कि ग्यारहवीं सदी में क़ियामत आ चुकी तथा अल्लाह तआला अपने वादे के अनुसार इमाम महदी साहिब्बुज़मां श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप में आ चुके हैं । क़ियामत के सात निशान निम्नलिखित हैं-

१. आजूज माजूज का प्रकट होना

२. दाभतूलअर्ज़ जानवर का प्रकट होना

३. सूरज का पश्चिम (मगरब) में उदय होना

४. गधे के ऊपर काने दज्जाल का प्रकट होना

५. ईसा रूह अल्लाह का आना

६. अशराफील फरिश्ते का आना

७. इमाम महदी का प्रकट होना

 

१. आजूज माजूज का प्रकट होना

क़ुरआन १६/१८/९३-९८ में आजूज-माजूज के प्रसंग का वर्णन है । कतेब की मान्यता के अनुसार आजूज-माजूज नूह नबी के पोते हैं अर्थात् याफिस की संतान हैं । कुछ लोग इन्हें मध्य एवं पूर्व एशिया की असभ्य जातियां भी मानते हैं, जो अन्य देशों पर आक्रमण करके लूट मार मचाती थीं । इनसे सुरक्षा के लिए दीवार भी बनाई गयी थी । यह दीवार अष्ट धातु की मानी गयी है । आजूज १०० गज का तथा माजूज एक गज का माना गया है । इनके जोड़ों की संख्या चार लाख तथा तीन फौजें तूला, ताबा और साबा मानी गयी हैं । अष्टधातु की पतली दीवार को आजूज माजूज चाटते रहते हैं । शाम तक वह कागज के बराबर पतली रह जाती है, किन्तु सुबह तक पहले जैसी हो जाती है । ऐसा कहा जाता है कि जब तक खुदा नहीं चाहें, तब तक अष्टधातु की इस दीवार को नहीं तोड़ सकेंगे ।

श्री प्राणनाथ जी की वाणी से इसके बातूनी भेद स्पष्ट हो जाते हैं । आजूज दिन को तथा माजूज रात्रि को कहते हैं । दिन के समय मनुष्य के मन की वृत्तियाँ १०० तरफ दौड़ती हैं, इसलिए आजूज को १०० गज का लम्बा कहा गया है ।

बड़ा कहया इन माएनों , करी रोसन आकास जिमी ।

सौ गज कहे सौ तरफों के , दौड़े खाहिस दिन आदमी ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप- मा. सा. ११/२४)

रात्रि को माजूज कहते हैं । माजूज को एक गज का लम्बा इसलिए कहते हैं क्योंकि रात्रि में सो जाने पर मन की वृत्तियां एक ही तरफ हो जाती हैं । जीवधारियों का यह पंचभौतिक शरीर ही अष्टधातु (रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र और ओज) की दीवार है । प्रातः, दोपहर और सायंकाल ये तीन फौजे हैं । आजूज-माजूज निरन्तर सबकी आयु का हरण कर रहे हैं । जब ख़ुदा के हुक्म से महाप्रलय होगी तो इस दुनिया में कुछ भी नहीं बचेगा अर्थात् आजूज-माजूज रूपी काल के द्वारा सांसारिक प्राणियों की उम्र रूपी दीवार को तोड़ दिया जायेगा ।

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२. दाभ-तुल-अर्ज़ जानवर का प्रकट होना

क़ुरआन २०/२७/८२ में दाभ-तुल-अर्ज जानवर का वर्णन है, जो क़ियामत के समय प्रकट होगा । इस जानवर की शक्ल विशेष प्रकार की होगी अर्थात् उसकी छाती शेर की होगी, पीठ गीदड़ का होगी, गर्दन मुर्गे की होगी, कान हाथी के होंगे, सिर पर पहाड़ी बैल के तीखे सींग होंगे, आँखें सुअर की होंगी, किन्तु उसका मुख आदमी का होगा ।

शरीयत का पालन करने वाले ज़ाहिरी मुसलमान इसका वास्तविक अर्थ नहीं समझते । इमाम महदी श्री प्राणनाथ जी ने अपनी वाणी में इसका रहस्य इस प्रकार स्पष्ट किया है-

कलियुग में अल्लाह (परमात्मा) के प्रति ईमान से रहित मनुष्यों में दाभ-तुल-अर्ज जानवर की सभी विशेषतायें हैं । उस जानवर रूपी इन्सान की छाती को शेर का इसलिए कहा गया है कि जिस प्रकार शेर निर्दयतापूर्वक पशुओं का संहार करता है, उसी प्रकार इन्सान भी दया-प्रेम से रहित होकर अन्य प्राणियों को पीड़ा देने वाला हो जायेगा ।

गीदड़ की पीठ बहुत कमजोर होती है । वह डण्डे का सामान्य प्रहार को भी सहन करने में असमर्थ होती है । मनुष्य भी क़ियामत के समय धर्म के शुभ कार्यों से दूर रहने वाले हो जायेंगे । मनुष्य लौकिक कार्यों के लिए सब कुछ अर्पित करेगा परन्तु आध्यात्मिकता से संकोच करेगा ।

मुर्गे की गर्दन अति आवश्यक कार्य जैसे खाने आदि के लिए भी बहुत कठिनता से झुकती है । क़ियामत के समय इन्सान इतना अधिक अभिमानी स्वभाव का हो जायेगा कि वह बड़े-बुजुर्गों एवं महान पुरुषों का सत्कार करने में भी अपना अपमान समझेगा ।

हाथी अपनी स्तुति पर ध्यान नहीं देता, किन्तु अपने प्रति कहे हुए कठोर शब्दों को वह अवश्य याद रखता है तथा बदला लेने की भावना में जलता रहता है । क़ियामत के समय मनुष्यों का स्वभाव भी केवल बुरी बातों (निंदा, अश्लीलता, आदि) को सुनने की चाहत वाला बन जायेगा ।

पहाड़ी बैल के सींग बहुत नोकदार एवं मजबूत होते हैं । उसमें हमेशा किसी न किसी प्राणी से झगड़े की प्रवृत्ति बनी रहती है । यदि कोई जानवर उससे झगड़ा करने के लिए नहीं मिलता तो वह झाड़ियों में ही अपने सींगों को उलझाकर अपनी इच्छा पूरी करता है । जब क़ियामत का समय आयेगा, तो मनुष्य भी बिना कारण दूसरों से झगड़ा करने में अपना गौरव समझेगा ।

सूअर की दृष्टि स्वादिष्ट पदार्थों की अपेक्षा हमेशा गन्दे पदार्थों की तरफ ही रहती है । उसके सामने कोई स्वादिष्ट व्यंजन रख भी दिया जाये तो वह मुँह फेर लेता है । इसी प्रकार क़ियामत के समय इन्सानों की दृष्टि (मनोवृत्ति) विषय विकारों की ही तरफ रहेगी, परमात्मा की भक्ति में नहीं ।

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३. सूरज का पश्चिम (मगरब) में उदय होना

तफ़्सीर-ए-हुसैनी भाग २ पृष्ठ १७६ पर क़ियामत के समय पश्चिम में सूरज के उगने का वर्णन है, जो मुसलमानों के लिए बिना रोशनी का होगा । सृष्टिक्रम के विपरीत यह बात एक गहरे रहस्य की तरफ संकेत करती है, जिसे ज़ाहिरी मुसलमान नहीं जानते । वे अभी भी यही समझते हैं कि यह सूर्य (नक्षत्र) ही पश्चिम की तरफ से निकलेगा ।

आखिरी इमाम श्री प्राणनाथ जी ने अपनी वाणी में इस रहस्य का स्पष्टीकरण इस ��्रकार किया है-

सो नूर सब इत आईया , इन जिमी मसरक ।

तब वह जिमी दाभा भई , जैसे पहले थी बिना हक ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप- खु. १५/३६)

मक्का-मदीना से शरीयत के बादशाह औरंगज़ेब (हिन्दुस्तान) के पास चार वसीयतनामें लिखकर आये, जिनमें उन्होंने कसम खाकर लिखा था कि मक्का से क़ुरआन की शफ़कत तथा बरकत उठ गई और यहाँ से नूरी ज्ञान का झण्डा भी उठ गया है । जब क़ुरआन के मारफत का ज्ञान हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के तन में प्रकट होने वाले इमाम महदी के तन में आ गया, तो रसूल मुहम्मद (सल्ल.) के अरब में आने से पहले मक्का की जो हालत थी, पुनः वैसी हो गयी ।

रूह अल्ला महमद इमाम , मसरक आए जब ।

सूरज गुलबा आखिरी , मगरब ऊग्या तब ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप- खु. १५/३८)

जब रूह अल्लाह (श्री श्यामा जी), रसूल साहब (श्री अक्षर ब्रह्म) और इमाम महदी (अक्षरातीत) हिन्दुस्तान में श्री जी साहब श्री प्राणनाथ जी के रूप में ज़ाहिर हुए, तो परमधाम का ज्ञान रूपी सूर्य पूर्व दिशा (हिन्दुस्तान) में उगा हुआ माना गया और अरब की धरती को पश्चिम की दिशा माना गया । वहाँ नूरी ज्ञान का झण्डा न होने से अज्ञानता का साम्राज्य छा गया । इसे ही पश्चिम में उगने वाला बिना रोशनी का सूर्य कहा गया ।

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४. गधे के ऊपर काने दज्जाल का प्रकट होना

दज्जालनामा किताब और हदीसों में दज्जाल के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया है । दज्जाल के विषय में कतेब ग्रन्थों में यह माना गया है कि क़ियामत के समय दज्जाल गधे पर बैठा हुआ होगा । उसका गधा चौदह लोकों से भी बड़े आकार का होगा और वह स्वयं भी उतने ही विशाल आकार वाला होगा तथा उसकी एक ही आँख होगी । ईसा रूह अल्लाह उसका कत्ल कर देंगे जिससे दुनिया निर्मल हो जायेगी ।

ज़ाहिरी मुसलमान दज्जाल को कोई शरीरधारी पुरुष समझते हैं, जिससे बचाव के लिए वे नमाज पढ़ते समय भी सतर्क रहा करते हैं । यदि ज़ाहिरी अर्थ में ब्रह्माण्ड के आकार के गधे की कल्पना की जाये और उस पर उतना ही बड़ा दज्जाल बैठा दिया जाये, तथा किसी कारणवश वह ऊपर से गिर पड़े तो भला संसार कैसे बच सकता है ? साहिब्बुज़मां इमाम महदी श्री प्राणनाथ जी की वाणी श्री कुल्जम स्वरूप के द्वारा दज्जाल की वास्तविकता का खुलासा होता है -

क़ुरआन ८/७/११-१७ में एक प्रसंग वर्णित है । आदम पर सिजदा न करने के कारण अजाजील पर गुनाह लगा । उसने ख़ुदा से अपनी बंदगी के बदले आदम की उम्मत के दिल और आँखों पर अपनी बादशाही माँगी । अबलीश (शैतान) अजाजील के ही मन का स्वरूप है । यह कुन्न की दुनिया अजाजील की ही बनाई हुई है । सभी प्राणियों में अजाजील के अंश (जीव) और अबलीश (मन) की ही बैठक है । यह अजाजील रूपी दज्जाल ही है जो सबको एक परमात्मा (अक्षरातीत, अल्लाह) की भक्ति से हटाकर अपनी पूजा करवा रहा है ।

अजाजील (दज्जाल) को एक आँख से काना इसलिए कहा गया है क्योंकि वह सभी जीवों को धर्मग्रन्थों के गुह्य रहस्य (आन्तरिक भेद) नहीं समझने देता । उसकी बादशाही के कारण मनुष्यों की आन्तरिक दृष्टि नहीं खुल पाती । निराकार (हवा) में अजाजील का निवास है, इसलिए निराकार को ही गधा कहा गया है । निराकार रूपी गधे की इतनी अधिक ऊँचाई है कि सातों समुद्रों का पानी उसकी जांघों के नीचे तक भी नहीं पहुँच पाता ।

जेता कोई बनी आदम , कहया निकाह अबलीस से ।

कहया दुनी बीच अबलीस , लोहू ज्यों तन में ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप- मा. सा. ९/१३)

संसार में जितने भी मनुष्य हैं, उनकी शादी अबलीश (शैतान) से हुई है अर्थात् वे उसके वशीभूत हैं । जिस तरह से शरीर में खून होता है, उसी तरह यह प्राणियों के दिल में बैठकर माया की हिरस हवा में फँसाये रखता है तथा एक परमात्मा श्री प्राणनाथ जी के चरणों की बन्दगी से दूर किये रहता है ।

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५. ईसा रूह अल्लाह का आना

तफ़्सीर-ए-हुसैनी भाग १ पृष्ठ १९३ में लिखा है कि ईसा साहब रूह हैं, जो हक़ तआला से उतरी । तफ़्सीर-ए-हुसैनी भाग २ पृष्ठ ३९० पर यह बयान है कि ईसा रूह अल्लाह (श्री श्यामा जी) दमिश्क (मारवाड़) में प्रकट होंगे तथा वलायत साम (हिन्द) में दज्जाल का कत्ल करेंगे । ईसा रूह अल्लाह के द्वारा दज्जाल का कत्ल किये जाने का अर्थ यह है कि जब वे तारतम ज्ञान लायेंगे तो उस ज्ञान को ग्रहण कर मानव एक सच्चिदानन्द परमात्मा की पहचान कर लेंगे और अजाजील की पूजा एवं मायावी सुखों की तृष्णा को छोड़ देंगे ।

एक जगह यह भी वर्णन है कि ईसा रूह अल्लाह अपनी तलवार से ७२ करोड़ काफिरों का कत्ल करेंगे । यह भी अलंकारिक वर्णन है कि ईसा रूह अल्लाह (श्री श्यामा जी) संसार में तारतम ज्ञान रूपी तलवार प्रकट करेंगे, जिस ब्रह्मज्ञान (आत्मिक प्रेम) को पाकर जीव की लौकिक इच्छाएँ समाप्त हो जायेंगी । मनुष्य शरीर में फैली हुई ७२ करोड़ नस-नाड़ियों को ही काफिर कहा गया है क्योंकि यह शरीर और इसकी आवश्यकताएँ ही परमात्मा के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है ।

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६. इस्राफील फरिश्ते का आना

ज़िबरील और इस्राफील दोनों ही अक्षर ब्रह्म के फरिश्ते हैं । हिन्दू धर्मग्रन्थों में जिसे अक्षर ब्रह्म की जाग्रत बुद्धि कहा जाता है, उसे ही क़ुरआन में इस्राफील कहा गया है तथा जिसे जोश का फरिश्ता कहा जाता है, उसे क़ुरआन में ज़िबरील कहा गया है ।

नूर अकल इस्राफील , ले पोहोंच्या पार बेहद ।

जिन कोई हिसबो खेल में , याको रंचक न लगे सब्द ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप-सनंध ३८/९४)

क़ियामत के समय इस्राफील फरिश्ते के भी अवतरण का वर्णन है, जिसके माध्यम से परमधाम का वह अनुपम ज्ञान अवतरित होना है जिससे सारी दुनिया इस दुःखमय भवसागर से पार हो जायेगी तथा अज्ञानता के बड़े-बड़े पहाड़ (आचार्य, मौलवी-मुल्ला व पादरी) भी नष्ट हो जायेंगे अर्थात् शक्तिहीन हो जायेंगे । तफ़्सीर-ए-हुसैनी भाग २ पृष्ठ ४१ पर लिखा है कि क़ियामत के दिन इस्राफील सूर फूंकेगा तथा पहाड़ों को जड़ से उखाड़ देगा । सब पैरवी करेंगे, मोमिन तो जल्दी के साथ और काफ़िर देर के साथ ।

तो मुसाफ मगज असराफीलें , किए जाहेर कई विध गाए ।

एक सूरें दुनी फना करी , किए दूजे सूरे कायम उठाए ॥ (श्री कुल्जम स्वरूप-मा. सा. १२/२५)

अर्थात् जाग्रत बुद्धि के फरिश्ते इस्राफील ने अल्लाह स्वरूप श्री प्राणनाथ जी की आज्ञा से क़ुरआन के बातूनी भेदों को स्पष्ट किया । उसने अपने ज्ञान के एक सूर से दुनिया की अज्ञानता को समाप्त कर दिया तथा दूसरे सूर से पूरे ब्रह्माण्ड को अखण्ड मुक्ति की बख्शीश दी ।

इमाम महदी श्री प्राणनाथ जी की कृपा से जाग्रत बुद्धि की तारतम वाणी (श्री कुल्जम स्वरूप) का अवतरित होना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस्राफील ने आकर सूर फूंक दिया है । श्री कुल्जम स्वरूप वाणी के अवतरण की लीला श्री प्राणनाथ जी के द्वारा प्रकट रूप में पाँचवे दिन अर्थात् सम्वत् १७१२ से १७५१ के बीच हुई । उसके बाद से मोमिनों की लीला का यह छठा दिन लगभग तीन सौ वर्षों से चल रहा है । छठे दिन की लीला पूरी हो जाने पर इस्राफील फरिश्ता दूसरी बार सूर फूंकेगा जिससे सारे ब्रह्माण्ड को योगमाया (बहिश्तों) में मुक्ति मिलेगी ।

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७. इमाम महदी का प्रकट होना

हदीसों में इमाम महदी के बारे में लिखा है कि वे परदे में आयेंगे । यहाँ परदा से तात्पर्य हिन्दू शरीर से है । तफ़्सीर-ए-हुसैनी भाग २ पृष्ठ ३५२ पर भी लिखा है कि ईसा रूह अल्लाह (श्री देवचन्द्र जी) की जमात में अधिकतर यहूदी (हिन्दू) होंगे ।

कट्टर शरीयत के नियमों से बँधे हुए मुसलमान साहिब्बुज़मां इमाम महदी श्री प्राणनाथ जी की पहचान इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि उन्होंने हिन्दू तन धारण किया है । इमाम महदी से दूर रहकर वे खुदाई ज्ञान रूपी सूर्य के उजाले में नहीं आ पाते ।

क़ुरआन ७/६/३६ में क़ियामत के समय ख़ुदा के द्वारा मुर्दों को कब्रों से उठाये जाने का प्रसंग है । क्या आज के वैज्ञानिक युग में इस तरह की बात पर कोई विश्वास कर सकता है ? इसका गुह्य अर्थ न समझ पाने के कारण ही यह बात अविश्वसनीय लगती है । आध्यात्मिक विज्ञान का मर्म आत्मिक दृष्टिकोण से ही समझा जा सकता है । इस मनुष्य शरीर को ही कब्र कहा गया है तथा उसके अन्दर बैठे जीव को मुर्दा कहा गया है । जीव को मुर्दा इसलिए कहा गया है कि यह नाचीज़ जीव अलौकिक ब्रह्मज्ञान (हकीकत व मारिफत का ज्ञान) को सुनने योग्य नहीं है तथा वह मरे समान है जो कभी पुनर्जीवित नहीं होते । परमात्मा ही यह करिश्मा कर सकते हैं कि वे उसे भी यह ज्ञान प्रदान करके जीवित कर दें । परमात्मा स्वरूप श्री प्राणनाथ जी अपने तारतम ज्ञान से जीव की अज्ञानता (निद्रा) को नष्ट कर देंगे और उसे ब्रह्मज्ञान से युक्त कर देंगे, तो इसे ही मुर्दे का कब्र से उठना कहा गया है ।

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प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा