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विनम्र निवेदन

ऋग्वेद का कथन है कि 'केवलाघो भवति केवलादि' अर्थात् अकेले ही धन आदि का उपयोग करना पाप है । वस्तुतः धन का त्यागपूर्वक उपभोग होना चाहिए ( तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः ) । धर्मपूर्वक उपार्जित धन को मानव कल्याण में लगाना सबका कर्त्तव्य है । अपनी आवश्यकता से बचे हुए धन को सेवा कार्यों में लगाना ही विवेकवान की पहचान है । श्री मुखवाणी का कथन है कि तमे प्रेम सेवाए पामसो पार अर्थात् परब्रह्म के प्रति प्रेम एवं तन-मन-धन की सेवा ही इस संसार से पार कराएगी । अतः सभी धर्म प्रेमी सज्जनों से निवेदन है कि ज्ञान प्रचार के पवित्र उद्देश्य के लिए खुले ह्रदय से सेवा करें ।

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा