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  अध्यात्म  »  पराविद्या और पराशक्ति

पराविद्या और पराशक्ति

वह विद्या जो इस नश्वर ब्रह्माण्ड व निराकार मण्डल से परे का ज्ञान दे , उसे ही पराविद्या की संज्ञा दी जा सकती है ।

उपनिषद में कहा गया है कि पराविद्या वह विद्या है जो जागृत बुद्धि है और उसी से अक्षर ब्रह्म को जाना जाता है (मुण्डक. १/१/५) । उपनिषदों तथा कुरआन में संकेत में परे का ज्ञान है परन्तु स्पष्ट व पूर्ण वर्णन तो जागृत बुद्धि के बिना किया ही नहीं जा सकता । वस्तुतः श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञान ही जागृत बुद्धि का ज्ञान है ।  

या वानी के कारने , कई करें तपसन ।

या वानी के कारने , कई पीवें अगिन ।।  ( श्री मुख वाणी- प्र. हि. ३१/९५ )

जागृत बुद्धि की इस तारतम वाणी का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनेक लोगों ने कठोर तप किया । कई ने अग्निपान भी किया । परन्तु यह ज्ञान तो श्री प्राणनाथ जी की कृपा के बिना प्राप्त ही नहीं किया जा सकता ।

ऐते दिन त्रैलोक में , हुती बुध सुपन ।

सो बुधजी बुध जाग्रत ले , प्रगटे पुरी नौतन ।।  ( श्री मुख वाणी- परि. २/११ )

आज दिन तक इस ब्रह्माण्ड में स्वप्न की बुद्धि का ही ज्ञान था जिसकी पहुँच निराकार मण्डल तक ही थी । जब विजयाभिनन्द बुद्ध श्री प्राणनाथ जी का इस कलयुग की भूमि पर अवतरण हुआ , तो उनके साथ जागृत बुद्धि का तारतम ज्ञान प्रकट हुआ । इस जागृत बुद्धि के ज्ञान से ही क्षर व अक्षर से परे अक्षरातीत के स्वरूप व धाम का पता चला । 

अपराविद्या वह विद्या है जो स्वप्न की बुद्धि से उत्पन्न होती है तथा निराकार तक का ज्ञान देती है । अपराविद्या में चारों वेद तथा इसके छः अंग ( शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , छन्द व ज्योतिष ) आते हैं । वेदों को अपरा विद्या में गिनने का कारण यह है कि उनमें परा के ज्ञान के अतिरिक्त सांसारिक ज्ञान अधिक दिया है । परन्तु वेदों का मूल बीज अव्याकृत (अक्षर ब्रह्म का चतुर्थ पाद) के अन्दर है ।

सुपन बुध बैकुण्ठ लों , या निरंजन निराकार ।

सो क्यों सुन्य को उलंघ के , सखी मेरी क्यों कर लेवे पार ।। ( श्री मुख वाणी- परि. २/४ )

इस माया के संसार में परब्रह्म का स्वरूप नहीं है । इस कालमाया के ब्रह्माण्ड के शब्द , मन , चित्त और बुद्धि के द्वारा निराकार से आगे नहीं जाया जा सकता है । सपने की बुद्धि बैकुण्ठ और निराकार तक ही जा सकती है । इससे भी परे बेहद एवं उससे परे अक्षर-अक्षरातीत तक सपने की बुद्धि की पहुँच हो ही नहीं सकती है ।

गीता में पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , मन , बुद्धि एवं अहंकार को अपराशक्ति कहा गया है क्योंकि यह बनते और मिटते हैं । यह मिथ्या नाशवान शक्ति हैं । ( गीता ७/४ )

इस अपरा से परे दूसरी चेतन अखण्ड शक्ति है , जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बनता है (गीता ७/५)। अतः जिससे करोड़ों ब्रह्माण्ड पैदा होते हैं और नष्ट होते हैं , उसे ही पराशक्ति कहते हैं । उसे बेहद मण्डल , योगमाया अथवा अक्षर ब्रह्म का चतुर्ष्पाद स्वरूप भी कहते हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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